डॉ. गरिमा मिश्र “तोष”

(अंग्रेजी साहित्य में एमए, लेकिन रचनात्मकता और मन के भावों को हिन्दी साहित्य में बखूबी व्यक्त करती हैं,  अपने लेखन  को सदैव वास्तविकता की सतह और कल्पनिकता के सौंदर्य के बीच बखूबी संतुलित रखती हैं। अतः वो केवल लिखने को नहीं लिखती.. वो लिखती हैं क्योंकि वो जीती हैं ।)

श्रद्धा से श्राद्ध सदैव

मनकही में आज श्रद्धा की बात श्रद्धेयजनों के आशीष की आकांक्षा में, मैं करने जा रही हूं ,श्राद्ध पक्ष चल रहे हैं अश्विन कृष्ण प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक हम श्रद्धा से आह्वाहन कर अपने पितृजनों का ,उनकी मुक्ति के लिए पूजन तर्पण और अग्निहोत्र करते हैं।

.. मैं श्राद्ध को कर्मकांड के गहन छाप से मुक्त मानते हुए यही मानती हूं की माह के मात्र पंद्रह दिन नहीं सदैव ही उन मुक्तात्माओं को श्रध्दा की विपुल पूंजी देनी चाहिए ..जिन पुरखों के अंश रक्त लेकर हमारी देह बनी.. बड़े अभिमान से पिंड बनाकर उन्ही पुरखों को हम तारने का क्या ही दंभ करते हैं,अरे इस आभासी संसार में मुक्ति के सेतु से पितृ जनों को हम क्या मुक्त करने के योग्य हैं भी? यदि हम  स्वयं को स्वयं के अहंकार , श्रेष्ठता के भाव से मुक्त करने का प्रयास करें तो कदाचित पितृ प्रसन्न हो आशीष दें।

पितृपक्ष में अर्यमा पित्र देवता के साथ-साथ समस्त पितृप्राण पृथ्वी पर व्याप्त रहता हैं हिंदू धर्म के अनुसार उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र इनका निवास लोक है आर्यमा अदिति के तीसरे पुत्र और आदित्य नामक सौर देवताओं में से आर्यमन या आर्यमा को पितरों का देव भी कहते हैं …

आकाश में आकाश गंगा उन्हीं के मार्ग का सूचक है सूर्य से संबंधित इन देवता का अधिकार प्रातः और रात्रि के चक्र पर है चंद्र मंडल पर स्थित पित्रलोक में आर्यमा सभी पितरों के अधिपति नियुक्त हैं ,जड़ चेतनमई सृष्टि में शरीर का निर्माण पित्र ही करते हैं श्राद्ध के समय इनके  नाम से जल दान दिया जाता है, यज्ञ अग्निहोत्र में मित्र( सूर्य )तथा वरुण (जल )देवता के साथ स्वाहा का “हव्य “और उसमें स्वधा का “कव्य “दोनों स्वीकार करते हैं।

अमावस्या का शाब्दिक अर्थ है सूर्य की सहस्त्र किरणों में जो सबसे प्रमुख किरण है उसका नाम अमा होता है उसी अमा नामक प्रधान किरण के तेज से सूर्य समस्त लोको को प्रकाशित करते हैं ,उसी अमा को तिथि विशेष को चंद्र (वस्या) का भ्रमण होता है अपनी कक्षा से ..मान्यता है उसी क्षण जब वस्य का अमा की कक्षा में परिवर्तन होता है पित्र चंद्रलोक से उसी किरण के माध्यम से पृथ्वी लोक पर आते हैं और अपने अपने परिजनों के साथ रहकर उनके श्रद्धा कर्म को श्राद्ध विधि से ग्रहण कर तृप्त होते हैं ।

वैसे मेरे मन में श्राद्ध के लिए श्रद्धा ही है जो जल अग्निहोत्र और भोजन से भी वरीयता लिए हुए है, जब तक श्रद्धा ना हो कोई श्राद्ध पूर्ण नहीं ..मनुस्मृति ,ब्रह्म, वरुण ,विष्णु, वायु वराह , मत्स्य आदी पुराणों में श्राद्ध की महिमा का वर्णन बहुत गहनता से है। हर नवीन पीढ़ी में उनके संस्कारों, रक्त धमनियों में व्यवहारों में शिक्षा में आचार विचार में पित्र बसे होते हैं जो श्राद्ध पक्ष की काल अवधि में निकट होकर पूजा से तर्पण से हवन से तृप्त होकर आने वाली संतति पर अपने आशीर्वाद बरसाते हैं ।

श्राद्ध की महिमा में कहा गया है आयुः, पूजा , धनं, विद्या ,स्वर्ग, मोक्ष ,सुखानी चा प्रयचछती तथा राज्यम पितृ श्राद्ध तर्पिता, अर्थाथ जो लोग अपने पितरों का श्राद्ध श्रद्धा पूर्वक करते हैं उनके पितृगण संतुष्ट होकर उन्हें आयु संतान धन स्वर्ग राज्य और मोक्ष व अन्य सौभाग्य प्रदान करते हैं..क्योंकि हमारे धर्म ग्रंथों में माता पिता और गुरु को विशेष आदर देकर स्थापित किया गया है तो ये माना जाता है की पितृ प्रसन्न आडंबर से नहीं भाव से होते हैं पर जब प्रसन्न होते हैं  तो सारे देवता प्रसन्न हो जाएंगे , पितरम प्रतिमापन्ने प्रियते सर्वदेवता ..

आत्मिक प्रगति के लिए सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है श्रद्धा …श्रद्धा में शक्ति है तो नर को नारायण बना दे परंतु उसमें भी सदाशयता,समर्पण , और सद्भाव ही प्रमुख अंग है.. मैं श्राद्ध को कर्मकांड के गहन छाप से मुक्त मानते हुए यही मानती हूं की माह के मात्र पंद्रह दिन नहीं सदैव ही उन मुक्तात्माओं को श्रध्दा की विपुल पूंजी देनी चाहिए ..जिन पुरखों के अंश रक्त लेकर हमारी देह बनी.. बड़े अभिमान से पिंड बनाकर उन्ही पुरखों को हम तारने का क्या ही दंभ करते हैं,अरे इस आभासी संसार में मुक्ति के सेतु से पितृ जनों को हम क्या मुक्त करने के योग्य हैं भी? यदि हम  स्वयं को स्वयं के अहंकार , श्रेष्ठता के भाव से मुक्त करने का प्रयास करें तो कदाचित पितृ प्रसन्न हो आशीष दें।

पितृपक्ष में जो मुझे सबसे अधिक भाता है वह है ध्यान करना ,माला करना यह मेरा अपना माध्यम है उनसे, उनकी ऊर्जा से जुड़ने का हवन समर्पित करते हुए उसकी ऊर्ध्वमुखी धूम्र रेखा में अपने सारे भय ,मोह, प्रेम, समर्पण संदेहो को उन्हें सौंप कर मनो मैं रिक्त हो जाती हूं, और जल देते हुए उस गिरती धारा में अपने आभार आत्मीयता कृतज्ञता को सौंप मैं निश्चिंत हो जाती हूं कि मेरे पवित्र भाव उनको मिल गए होंगे जिस कारण मन आत्मा निर्मल होगई मेरी..और कभी-कभी सोचती हूं मात्र 3 पीढ़ियों के पितृ नहीं मुझे तो इस काल अवधि में युगों से आ रहे प्रपितामः या प्रपितामही चाहे मातृ कुल की हो या श्वसुर कुल के सबके अनकहे अधूरे भाव छू जाते हैं ..भाव रूप से, संस्कार रूप से और आंखें भरी भरी हो रहती हैं और ह्रदय आनंदित और घर में भोग बना करता है इष्ट के साथ-साथ पित्र देव भी तो ग्रहण करते हैं, मात्र पितृपक्ष में नहीं मैं जीवन काल में पूर्ण पवित्रता उत्कर्ष उत्कृष्टता को पोसने के भावों से जुड़कर श्राद्ध को श्रद्धेय करती हूं ।

सद्भावना की सुगंध जीवित और मृतक सभी को तृप्त करती है मेरा मानना है कि हम जीवित संबंधों को ही पोषित कर दें तो मृत आत्माओं को श्रद्धांजलि देना उतना आवश्यक अंग जीवन का नहीं रहेगा ,हमें उन आत्माओं का प्रेम सानिध्य आशीष सहज ही प्राप्त होता रहेगा ..कहते हैं ना ओम पितृगनाय विद्महे जगत धात्री धीमहि तन्नो पितरों प्रचोदयात इस मंत्र को गायत्री संपुट कर यदि श्रद्धा से एक बार भी हम अपने पितृ देवो का स्तवन कर ले तो कदाचित उनके आशीष अंक को कुछ अंग में प्राप्त कर सकेंगे और अपनी उत्कृष्टता उनके समक्ष रख सच्चे स्वरूप में आशीषसानिध्य को पा सकेंगे ,क्योंकि मेरा मानना है पित्र सर्व कल्याण समाज उद्धार और स्वयं के संस्कारों के शोधन से अधिक प्रसन्न होते होंगे ..बजाय इसके कि दिखावा या आडंबर हो जब हम जीवित संबंधों को पूरा समर्पण और सम्मान देते हैं तो मुक्त आत्माओं को सच्ची श्रद्धा दे ही सकते हैं और किन्ही मायनों में वही अधिकारी भी हैं।

मैंने देखा है बहुत से लोग बहुत बार जीवित संबंधों को कभी कभी अधिक उपेक्षित अपमानित एकाकी जीवन जीने को बाध्य करने वाले पूरे आडंबर के साथ मृत आत्माओं के हेतु श्राद्ध तर्पण करते हैं.. वे कैसे स्वयं से आंख मिलाते होंगे मैं यही सोचती हूं ,मेरी दादी जब भी किसी ऐसे व्यक्ति को मिलती थी तो उसके बाहरी आडंबर को देखकर बाद में मेरी मां से कहा करती थी बिटिया ऐसे लोगन को देख बहुत क्रोध आवत है, जो जियत न देवे कौरा मरे बनावे चौरा..मैं उस बालपन में जान ना पाती थी कि किस उपलक्ष में यह भाव रहे उनके पर अब इस आयु में इसकी तीखी चुभन अनुभव कर पाती हूं कि किस आडंबर से दूर रहकर प्रेम से सद्भाव से और परोपकार से श्राद्ध को संपूर्ण किया जा सकता है। जिसका आरंभ हमें जीवित रहते ही कर देना चाहिए मैं तो वैसे भी कुछ अलग विचारधारा की हूं पर विचारों की सतेज धार पूर्ण निष्ठा सत्य प्रेम और समर्पण से भरी हुई है अतः “श्रद्ध्या या इदम श्राद्ध”को ही अपना मूल मंत्र मान मैं सदैव अपने पितृगणों के आशीष हेतु पूर्ण श्रद्धा के साथ प्रार्थना रत रहती हूं एक पक्ष नहीं प्राण ऊर्जा के स्वरूप पंच तत्वों के माध्यम से मैं उनकी उपस्थिति अपने आसपास सदैव पाती हूं पितृगण सूर्य की रश्मियों, में पक्षियों के कलरव, में वृक्षों में ,पुष्पों ,में तितलियों में ,जल में ,भोजन में, फलों में सब ही में व्याप्त हैं ऐसा भान होता है मुझे अतः हृदयांजलि देते हुए इस श्राद्ध पक्ष के समस्त  पितृगणों को श्रद्धांजलि देते हुए मैं मन कहीं में कुछ प्रश्न छोड़े जा रही हूं जो मेरे हृदय में यदा-कदा उठते रहते हैं ..श्राद्ध में जब सारे भोजन की व्यवस्था अन्नपूर्णा स्त्री करती है घर की तब पिंडदान में उसकी भूमिका नगण्य है क्यों? जिन घरों में मात्र कन्याएं हैं क्या उनके पित्र उन कन्याओं को श्राद्ध करते देखकर प्रसन्न होकर आशीष ना देंगे ?और श्रद्धाश्राद्ध में  भेद भाव कर्मकांड भला कैसे ला सकता है आप सभी के मन की बात आज यहां उतार लाई हूं…उत्तर स्वयं ही ढूंढ कर हम स्वयं को बता देंगे तब तक श्रद्धा का अभ्यास मात्र पंद्रह या सोलह दिन नहीं सदैव करने से हमारे पितृ तृप्त  होंगे ऐसा मुझे लगता है इति शुभम ओम पितृ देवाय नमः

स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित…

Leave a Reply

Your email address will not be published.