डॉ. गरिमा मिश्र “तोष”

अंग्रेजी साहित्य में एमए, लेकिन रचनात्मकता और मन के भावों को हिन्दी साहित्य में बखूबी व्यक्त करती हैं। शास्त्रीय संगीत गायन विधा में विशारद, कई किताबों का प्रकाशन एवं साहित्य के क्षेत्र में कई सम्मान प्राप्त।लगभग अठारह वर्षों से सतत रचनात्मक ,आध्यात्मिक आत्मिक एवं संबंधात्मक गतिविधियों एवं उन्नयन हेतु सेवारत।

मनकही में इस दफे अपना सर्वाधिक प्रिय विषय ब्रह्मांड की उपस्थिति आत्मा के आरोह- अवरोह सी,लेकर उपस्थित हूं।

मुझे बचपन से तारक,चंद्र ,आकाश ,ब्रह्मांड ,सौरमंडल ऐसे जागृत आभासी विषय लगते रहे ..जिस को सोचते विचारते मनो मैं,आत्म स्थित हो जाया करती थी, आकाश से मेरा संबंध मैं बहुत छोटी थी तब मेरी दादी ने  बना दिया था। हुआ यूं की जब मेरा छोटा भाई हुआ तो मुझे कहा गया कि ये आकाश से आया है ,भगवान ने भेजा है और उसी 1 बरस में जब मेरे सबसे छोटे चाचू नहीं रहे तो मुझे कहा गया कि वह आसमान में ,आकाश में चले गए तारा बन गए.. तो 4 वर्ष का बाल मन मेरा उस आकाश से ऐसा संबंध बना बैठा जैसे माता-पिता। मैं सोचती थी यह कोई है बहुत बड़ा सा जो हमें खुशियां देता है यह कोई है बहुत बड़ा सा जो हमसे हमारे अपनों को सहेज कर रख भी लेता है, तारा बना कर …यह सारे भाव उस उम्र में उस छोटी सी आयु में मेरे मन मस्तिष्क पर डोलते रहते थे और मैं रात दिन जब समय मिलता था आंखें ऊंची करके सर ऊंचा करके उस झुके हुए नीले रंग को देखती रहती यही सोचती थी कि यह कोई है जो हमें बहुत कुछ देता है जो हमारे साथ हमेशा रहता है।

एक तरंग ऊर्जा से घिरा मेरा बालमन आज इस प्रौढ़ावस्था में भी उसी तरह से चकित होता है आकाशीय आभा से ,कैसा सपनीला सा नीलाकाश उस पार के गहन नादित ब्रह्म नाद को धारे होगा? कैसे सुनहरी किरणे प्रकृति पर जीवन संदेश लेकर बिखरती हैं ?कैसे कितना शीतल ईश तत्व सा जल आशीष स्वरूप में धरा पर बरसता है ?यह वैज्ञानिक दृष्टि से सारे उत्तर स्वयं में धरे मानव मन जानकर भी उस चमत्कार को कैसे चिन्हित करें ,जिसको हम जन्मना कहते हैं, उपजना कहते हैं ,बरसना कहते हैं ।

जिस सिद्धांत के तहत लगभग 14 दशमलव 5 वर्ष पूर्व ब्रह्मांड की सारी ऊर्जा भौतिक पदार्थ और अस्तित्व एक बिंदु में कैद था और अचानक एक बड़े विस्फोट से समय स्पेस मैटर का अस्तित्व बना , माने जो वास्तव में  परब्रह्म है जो पूर्ण है ऊर्जा के स्वरूप में उसी के अनंत स्वरूप के विस्तार में ही ब्रह्मांड हो गया, और उस असीमित ब्रह्मांड के बहुत छोटे से बिंदु के स्वरूप हम पृथ्वी में बसे बिंदु से भी कम हिस्से के मानव.. आकाश को उसके स्वरूप को उसकी आभा को सारे जीवन में अर्धांश भी जान लें तो बहुत होगा ।

मैं कभी आकाश की शून्यता पर विश्वास नहीं कर पाती थी

भौतिकी के अनुसार पृथ्वी को घेरे हुए जो गोलाकार नीला गुंबज पड़ता है उसी को आकाश, गगन कहा जाता है ,चतुर्दिक दृष्टिपात कर जो नीला विस्तृत व्योम जान पड़ता है वह असल में आकाश है जो कृष्ण पक्ष की रात्रि में एक चौड़ी मेखला पर असंख्य तारों की संख्या को लिए क्षितिज के एक किनारे से जाकर ऊपर से होती हुई क्षितिज के ठीक दूसरी ओर जाकर मिलती हुई जान पड़ती है ,जो कि पूर्व विशाल चक्र के समान पृथ्वी को घेरकर आकाशगंगा बन जाती है ,यद्यपि आकाश के एक चकमक अंग चंद्रमा की दूरी पृथ्वी से केवल 229000 मील है जिसे तय करने में आकाश को कुल सवा  सेकंड लगता है, निहारिकाए भी हैं जो इतनी दूरी पर है की उनसे चलकर पृथ्वी तक पहुंचने में प्रकाश को सैकड़ों अथवा हजारों वर्ष लगते हैं,और हम मानव बड़ी-बड़ी बातें कर लेते हैं कि हमने यह ढूंढ लिया यह बना लिया या हम यहां पहुंच गए आखिर देखा जाए तो हम ना कहीं पहुंचते हैं और ना ही हम कभी कुछ बनाते हैं समय और शक्ति की धारा को समझते हुए सृजन और विसर्जन के मध्यम बिंदु में बंधे हम आकाशीय चमत्कार को क्षणिक अनुभूत भी कर लें यदि तो बहुत होगा अतः मैं उन सभी खोजो अविष्कारों और ज्ञान के भंडारों को ह्रदय से प्रणाम करती हूं जिन्होंने हमारे अस्तित्व को पर अस्तित्व से जुड़ा हुआ जाना और हमें समझाया की अस्तित्व का बोध क्या है।

इन तारों और नक्षत्रों से भरे हुए आकाश को देखकर मैं कभी आकाश की शून्यता पर विश्वास नहीं कर पाती थी मुझे लगा करता था कि कोई है जो सुबह नीला रंग छिड़ककर छत पर रात में धो जाता है पानी से, धरती की छत आकाश ही तो लगा करता था मुझे ,वो तो बहुत पढ़ने लिखने के बाद पता चला जो नीलापन है वह सूर्य की रश्मियों, किरणों का आभासी खेल है जिसमें से बैगनी लाल पीले रंग की प्रक्रिया नीला रंग प्रदान करती है.. जो की रश्मियों के प्रकीर्णन के द्वारा ही उत्पन्न होता है।

आकाश संसार में पंचमहाभूतों में प्रधान लगता है

मेरी मां सदैव एक मंत्र का करती हैं आकाशस्याधिपो विष्णुरमनश्चैव  महेश्वरी , वायोह सूर्य, क्षितिशो जीवनस्य गणाधीप,अर्थात आकाश तत्व के अधिष्ठाता विष्णु अग्नि तत्व की अधिष्ठात्री देवी दुर्गा  वायु तत्व के अधिष्ठाता सूर्य पृथ्वी तत्व के अधिष्ठाता शिव और जल तत्व के अधिष्ठाता गणेश हैं ,इस मंत्र की गहन चर्चा फिर कभी करूंगी पर हां यह जरूर मानती हूं कि नीला स्वरूप विष्णु स्वरूप ही हो सकता है यही नीला रंग तो मेरे कान्हा का भी है और वही आभा आकाश में सदैव पाती हूं ,सत्य पाती हूं। मुझे आकाश संसार में पंचमहाभूतों में प्रधान लगता है क्योंकि यह असीम और निराकार है अविनाशी भी है तभी आत्मा को सदैव सतेज रखने में सहायक होता है आंतरिक स्फूर्ति एवं प्रसन्नता की अनुभूति आकाश तत्व से ही संभव जान पड़ती है मुझे तो ,आकाश ऐसा है जो अवकाश को थमा देने स्थान देने वाला है ,एक ऐसा रिक्त स्थान जो पूर्ण रूप से भर दे वायु के स्वरूप में।

मेरे हृदय में आकाश की उपस्थिति मेरे उन छूटे हुए साथ प्रियजनों की निवास स्थली लगती है जिन्हें हम तारा हो जाना कहते हैं ,मुझे लगता है मेरे पिता मेरे पिता तुल्य श्वसुर और काका सभी एक परिधि में बंध कर अब आकाश में अवकाश मना रहे हैं, और पितृलोक से आशीष बरसा रहे हैं कभी ओस बनकर कभी वृष्टि बनकर कभी सचेत दृष्टि बनकर।आकाश को देखती हूं तो यही दिखता है कि कोई कितना बड़ा होकर भी कितनी सजगता से सहजता से अपने आश्रय में रहती दुनिया को देखता है, पूरे समय हर काल अवधि ऋतु में सदैव एक प्रेम मनोयोग से निहारता हुआ नितांत अपना सा कोई …आकाश की उर्जा जिस तरह असीमित है उसी तरह उसके चमत्कार असीम जान पड़ते हैं जितना गहरे आप उस रिक्तता को आत्मसात करेंगे उतना ही गहरे आप संपूर्ण होते हुए तृप्त होते हुए पूरे भर जाएंगे उत्साह से, स्वपनों से ,प्रेम से, भक्ति से और ज्ञान से …और  साथ के आभास से।

आकाश मुझे साथ के सबसे बड़े तत्वों से जोड़ देता है मेरे जीवन में जहां एक का अंत होता है उसी एकांत से मिला देने वाला मेरा सच्चा मार्गदर्शक मुझे आकाश जान पड़ता है, जहां कोई भी भाव सांझा करते हुए यह पूरा विश्वास रहता है कि हमारा भाव सही दिशा और दशा को प्राप्त करेगा जहां आत्मा को यह आभार प्रकट करने का माध्यम मिलता है कि हम हमारे अस्तित्व को जान पाते हैं क्योंकि आकाश अपनी आभा के साथ असीमित आशीष के साथ पूरे समय हमारे साथ खड़ा है या यूं कहूं कि हमें  सबल अंकपाश में बांधे हुए दीर्घ साथ के आश्वासन को पूर्ण कर रहा है, कुछ भी मांगो वह मैं दूंगा एक ऐसा आभास देने वाला सत्य और प्रकाश से भर देने वाला आकाश का साथ हृदय को पूर्ण जाए ऐसे काश को जन्म दे जाता है ,की काश हम आकाशीय आभा के वास्तविक स्वरूप को जान पाते, मन कहीं में आज इतना ही पुनः फिर मिलती हूं तब तक आकाश के दीर्घ साथ की आभा में डूबते उतरते रहिए ।

स्वरचित (सार्वाधिकार सुरक्षित)

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