संध्या रायचौधरी..,

आजादी के अमृत महोत्सव में हर विषय से संबंधित व्याख्या, विश्लेषण न केवल महत्वपूर्ण हैं बल्कि  अत्यंत आवश्यक भी है। वहीं, जब पत्रकारिता से संबंधित व्याख्या हो तो इतने अकल्पनीय बदलाव आ चुके हैं कि इसे सरल या सीमित शब्दों में समेटना एकदम असंभव है।

भारत में पत्रकारिता की शुरुआत मिश्न के लिए की गई थी। तब पत्रकारिता न तो खोजबीन के लिए और न ही आरोप-प्रत्यारोप, छींटाकशी के लिए होती थी। उद्देश्य था आमजन को जागृत करना, देशके प्रति ईमानदारी और सच्ची भावना के बीज प्रस्फुटित करना। यूं तो भारत में सबसे पहले एक अंग्रेज जेम्स आगस्टस हिकी ने सन् 1780 में कलकत्ता में साप्ताहिक बंगाल गजट’ प्रारम्भ किया था, किंतु सही मायने में जब हिन्दी पत्रकारिता के सूत्रधार युगल किशोर शुक्ल ने  1826 को उदन्तमार्तण्ड साप्ताहिक पत्र एवं राजा राममोहन राय ने संवाद कौमुदी  अखबार प्रकाशित किए तो ब्रिटिश सरकार के माथे पर बल पड़ गए। इन अखबारों में सीधे-सीधे आगाह किया जाता था अपनी अस्मिता को बनाए रखने के लिए। अंग्रेजों के कोपभाजन के कारण इन अखबारों को बंद तो करना पड़ा लेकिन एक मशाल तो भारतीयों के दिल में जल ही गई थी। कालांतर में धीरे-धीरे कई अखबार  दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक और पत्रिकाएं भी प्रकाशित होने लगे।  उन सबका ध्येय एक ही था अंग्रेजी साम्राज्य की कूटनीति का पर्दाफाश कर भारतीय जनता में आक्रोश की लहर भरना, तब आज की तरह न तो पेशेगत होड़ थी और न ही भ्रामक खबरों का माया जाल था। अंग्रेजी शासन के विरुद्ध के साथ सामाजिक कुरीतियों अशिक्षा, बाल-विवाह, सती-प्रथा के प्रति सचेत करना भी पत्रकारिता का उद्देश्य होता था।  प्रकाशक आपस में मिलकर तय करते थे कि किस तरह के संदेशों के साथ लिखा जाना है यही कारण था कि तब सम्पादकीय टिप्पणियां, अग्रलेख अत्यन्त प्रभावात्मक होते थे।

उस युग में शान्ति नारायण भटनागर का “स्वराज्य” अखबार जब शुरू हुआ तो अंग्रेजों के हाथ-पैर फूल गए क्योंकि उनके लेखों से जनक्रांति का सैलाब उमड़ने लगा लिहाजा उन्हें जेल में डाल दिया। तब स्वराज्य के प्रथम पेज पर एक विज्ञापन छपा-“चाहिए स्वराज्य के लिए एक सम्पादक वेतन दो सूखी रोटियां, एक गिलास ठण्डा पानी और हर सम्पादकीय के साथ दस साल की जेल।‘ आज के समय यह कल्पनातीत है।

आजादी के बाद भी पत्रकारिता काफी कुछ उद्देश्यपूर्ण ढंग से की जाती रही। लेकिन चूंकि तब आजादी सबका मिशन था इसलिए पत्रकारिता का स्वरूप भी समान था। आजादी मिल गई तो धीरे-धीरे पत्रकारिता का दरख्त दरकने सा लगा। न्याय के चौथे स्तंभ के रूप में पत्रकारिता बदलने लगी। 60 से लेकर 90 तक के दशक में जैसे अखबारों, पत्रिकाओं, बुलेटिनों की बाढ़ सी आ गई। दूरदर्शन और रेडियो भी पत्रकारिता से अछूते नहीं रहे। संपादक, पत्रकार, रिपोर्टर यानि अखबार से जुड़ा हर शख्स अपनी कलम की ताकत दिखाने लगा। अखबार का संपादकीय उस पत्र की आत्मा कहलाया जाता था, क्योंकि संपादकीय पढ़ने से अखबार के कलेवर का अहसास हो जाता था कि उनका झुकाव सरकार के प्रति है या विरोध में है। हम जैसे पत्रकारों को अपने तरीके से काम करने की, खबर लिखने की पूरी स्वतंत्रता रहती थी ।तब अखबार के दफ्तर सामान्य होते थे जहां हर आम इंसान आकर अपनी बात अपनी शिकायत आराम से कह सकता था, किसी छोटी से छोटी घटना पर भी बहुत मेहनत कर उसकी तह में जाकर सच्चाई का पता लगने के बाद ही छापा जाता था। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सबके लिए थी।

आम पाठक अखबारों के पावर प्वांइट हुआ करते थे….

कह सकते हैं कि आजादी से शुरू हुआ पत्रकारिता का स्वरूप बहुत तेजी से बदला नहीं था , हां अवश्य ही पेशेगत कुछ-कुछ समस्याएं, समझौते होने लगे थे लेकिन तब भी पत्रकारिता आमजन का ही प्रतिनिधित्व करती थी। क्योंकि आम पाठक ही अखबारों की यूएसबी या कहें पावर प्वांइट हुआ करते थे। हमारे लिए पत्रकारिता जुनून से भी ज्यादा थी। सबके लिए बराबर, न किसी का फायदा न नुकसान.. जो ठीक नहीं लगा वो लिखना, जिसने अच्छा किया उसका भी लिखना। तब न तो मालिक और न ही संपादक का दबाव होता था था कि वो जैसा चाहें वही लिखवाएं। पत्र-पत्रिकाओं की भाषा, उनकी मुखरता, शब्दों का बहुत महत्व होता था। एक उदाहरण देखिए…इंदौर के अत्यंत प्रतिष्ठित अखबार में बिजली गिरने पर संपादकीय छपा उसमें एक शब्द था तन पर जब बिजली गिरी..गलती से तन के  आगे  “स् ’ छप गया। सुबह तो हंगामा मच गया। बड़ी संख्या में महिलाएं  अखबार के दफ्तर पहुंची और अखबार के संपादक पर जमकर बरसीं। संपादक ने विरोधस्वरूप न तो सफाई दी और न ही नाराज हुए..बस हाथ जोड़कर सर झुकाए माफी माफी बोलते रहे। कहने का तात्पर्य है कि तब अखबारों का स्तर उसकी भूमिका सर्वोपरि होती थी। सूचना माध्यम अखबार, रेडियो, दूरदर्शन ही थे जिनमें रेडियो, दूरदर्शन सरकारी थे, बस प्रिंट माध्यमों को ही सबकुछ लिखने की स्वतंत्रता थी और इसका कभी बेजा इस्तेमाल नहीं किया गया। इन्हें चलाने वाले अपनी जिम्मेदारी, जबाबदारी और ईमानदारी मानते थे। अपना लाभ भी उठाते थे और आमजन को गलत सोच की ओर कभी नहीं मोड़ते थे। यह पाठक पर निर्भर था कि वे छपे हुए के साथ रहें या उससे अलग सोचें।

-पत्रकारिता पढ़ी नहीं दिखाई और सुनाई जाती है…

आजादी के बाद 90 के दशक तक जब तक प्रेस, मीडिया छपे हुए स्वरूप में थी तब तक सही मायने में कोई उंगली नहीं उठाता था क्योंकि  मालिकों का हस्तक्षेप बहुत कम होता था। जैसे-जैसे सूचना तंत्र विकसित होते गए, छपाई के साथ कैमरों का समावेश होता गया। मालिक जो कभी-कभार ही दफ्तर में आते थे, धीरे-धीरे उनका आना, कौन सी खबर, लेख छप रहे हैं इसकी जानकारी लेने लगे। कारपोरेट्स में बदलने लगे अखबार-पत्रिकाएं और इसी के साथ बदलने लगा पत्रकारिता का कलेवर। खबरों की जगह बाजार हावी होने लगा। मिशन की जगह ताकत और प्रभाव ने ले ली। जिसका जितना बड़ा विज्ञापन उसकी खबर और फोटो उतनी ही बड़ी छपने लगी। दिल से न चाहते हुए भी हमारी कलम हम नहीं कोई और चलवाने लगे।

और अब तो पूरे सूचना तंत्र में आमूल चूल परिवर्तन आ गया है। खबरें, सूचनाएं पढ़ाई नहीं जा रहीं दिखाई और सुनाई जा रही हैं, जिन संपादकों, रिपोर्टरों का चेहरा आम लोगों के लिए आम नहीं था, अब खबर बताने वाले पूरी शान-शौकत और ग्लैमर से भरपूर जनता के सामने आते हैं। हमें सफेद पेपर पर शब्दों की भाषा लिखते समय बहुत कुछ सोचना पड़ता था, अब वैसे शब्द और भाषा खंगालने पर ही मिलेंगे।

बेशक, बदलाव समय के साथ बहुत जरूरी है लेकिन उसके कारण किसी एक का फायदा और हजारों लोगों का नुकसान हो वो सही नहीं हो सकती। अब तो डि़जिटल, इलेक्ट्रॉनिक के अलावा टेक्नोलॉजी का पूरा जखीरा मौजूद है। अगले 75 सालों में इस माध्यम में कितना और क्या बदलाव आएगा…शायद ही कोई बता पाए। जैसा रहेगा, जैसा होगा उसी धारा के साथ बहना ही होगा।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.