राजीव सक्सेना

पत्रकारिता, रचनात्मक लेखन, कला – फ़िल्म समीक्षा, सिने – टीवी  पटकथा लेखन और निर्देशन के क्षेत्र में तीन दशक से सक्रिय हैं. जयपुर में निवास

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जड़ों से कटते हुए..तकनीक मेँ जकड़ते हम..

रेलवे स्टेशन  या कस्बे  की मुख्य सड़कों से कहीं अलग हट कर.. छोटी – छोटी पगडंडियों से होकर… पैदल या बैलगाड़ी – छकड़ों में बैठ… ‘गुंजा’ और ‘चन्दन’ की तरह… खेतों – खलिहानों.. की झूमती फसलों…  पोखर – तालाबों में अटखेलियां करते नन्हें ग्रामीण बच्चों..जानवरों के मनमोहक नज़ारे.. निहारते हुए…पहुंचा करते थे अपने गांव में… जहां..संकरी चार – पांच गलियों के बाद एक बड़े से गोबर लिपे आंगन और ओटलों के बीच दिखाई देता…खपरैल की छत वाला एक घर… ठकुराइन की तरह रस्सी वाली खाट पर बैठी दादी हमारा इंतज़ार करतीं मिलतीं…और, सच… तब लगता ज़िन्दगी का सबसे बड़ा सुकून यही होता है.. दादी के.. साथ हर पल सेवा में रहने वाले खेत के हाली – बाँटेदार…हमारे पहुँचते ही चुस्ती – फुर्ती में आ जाया करते… भैया जी.. भैया जी के प्रेम में घुले सम्बोधन के साथ खाने – पीने की तमाम सारी चीज़ों से स्वागत आत्मा को तृप्त करने के लिए पर्याप्त होता… मध्यप्रदेश के मालवांचल में, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ जी से लेकर शरद जोशी जी तक के जन्म स्थल शाजापुर जिले की ही एक तहसील…. कालापीपल  के रोंसी गांव में, गर्मियों की हर साल की छुट्टियों में लगातार दो महीने दादी कौशल्या देवी के साथ ठेठ ग्रामीण परिवेश में रहने का सिलसिला उन्नीस सौ चहोत्तर तक उनके बीमार होने और फिर उनके  ‘नहीं रहने’ तक चलता रहा… सारे गांव के लोगों को छोटी माता के टीके के लिए जागरूक करतीं… दादीजी…. सबके बच्चों के स्वास्थ्य की पूरी जानकारी रखतीं…गांव के लोग उनसे सलाह लिया करते…दादी के सभी बेटे बड़े अफसर थे… मेरे पिताजी, सभी ताऊजी… उनसे हर तरह की मदद गांव के ज़रूरतमंदों को आगे रह कर करवातीं… बारह बरस से ऊपर की समझ सकने… याद रख सकने वाली उम्र की… तब की एक – एक बात आज… स्मरण पटल पर उभर कर आती है… खास कर…तब..  ..  जब बाज़ारवाद और शहरीकरण से उपजी  सैकड़ों विषमताओं… विडम्बनाओं ने सारा माहौल सर पर उठा लिया हो…

यादों में बसा हुआ छोटा सा…. कस्बेनुमा शहर राजगढ़ रहा हो या मझौला नगर जबलपुर… अस्सी के उस दशक में भी तमाम तरह की महामारी..से देश भर पीड़ित रहा…पोलियो… चेचक… सरीखी बीमारियों के ख़तरनाक किस्म के वाइरस… तब भी… जनमानस पर हावी थे… खतरे उस वक़्त भी कम नहीं थे… लेकिन तकरीबन चालीस से पैंतालीस साल पहले के अपने ही.. इसी देश में.. राजनीति और सरकार… में एक खास वाइरस शायद… इस कदर नहीं फ़ैल पाया था… जितना आज है… भृष्टतंत्र या…लालफीताशाही का.. वाइरस… यूं तो इसका जन्म ‘राजतन्त्र’ और उसके बाद आये ‘लोकतंत्र’ की शुरुआत से ही हो चुका होगा… पर… ‘आटे में नमक’ की मात्रा के सामान ही रहा होगा…

पचास बरस से ऊपर के आप और हम कोई भी अपने उलटे हाथ के ऊपरी हिस्से को आज भी देखें तो वहां एक बड़ा सा दागा हुआ सा निशान जरूर पाएंगे… ये है उस ज़माने की सबसे बड़ी महामारी चेचक… स्माल पॉक्स या छोटी माताजी का टीका….तब के स्वास्थ्य विभाग के कर्ताधर्ताओं की तत्परता और हर एक शहरी ग्रामीण की जागरूकता का एक जीता – जागता उदाहरण….ठीक विगत दिनों भयानक माने जा रहे… ‘कोरोना’ के वाइरस की तरह… तब फैला था… चेचक का वाइरस…सिर्फ यही नहीं… इसके जैसी…कुष्ठ रोग… वगैरह  और भी कई सारी महामारी तब बाहरी देशों में अपना असर दिखा रहीं थीं… फर्क बस यही था कि… तब ना कोई सोशल मीडिया था… ना ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया…और ना ही मोबाइल फोन… साढ़े चार – पांच दशक पहले… बाज़ारवाद… या अत्याधुनिकता… फैशन.. जंक फूड… एक दूसरे से गलाकाट.. प्रतिस्पर्धा… ईर्ष्या – वैमनस्य…ये लोन.. वो लोन… ई एम आई… लेगपुलिंग…अध्यात्म के नाम पर बाबागिरी.. धर्म को लेकर घटिया दर्ज़े की राजनीति… जैसे वाइरस… इतने हावी नहीं थे… जितने कि आज हैं… और… इसीलिए शायद… कई सारी महामारियों को हम सब आसानी से बर्दाश्त कर गए… कुछ पर जीत भी हासिल कर ली…

अस्पतालों में टीकों… की व्यवस्था भी होती… नर्स… वार्डबॉय से लेकर डॉक्टर तक में सेवा भावना भी पर्याप्त होती… पोलियो के ड्रॉप्स समय पर बच्चों को पिलाने में मां – बहने भी.. आगे रहा करतीं…एन जी ओ या  ‘स्वैच्छिक संगठन’ के कार्यकर्त्ता भी… काफी हद तक अपने काम को सार्थक अंजाम दिया करते..वर्ल्ड बैंक से जुड़ी तमाम स्वास्थ्य परियोजनाएं…’यूनिसेफ’… ‘केयर’…से लेकर   ‘आई सी डी एस’… ‘आर सी एच’… तक सभी शुरुआती दौर में तब तक तो साफ सुथरी रहीं ही…. जब तक कि अफसरों – नेताओं की ‘नीयत’ उनके अरबों के  बजट को लेकर… नहीं बिगड़ने लगी.. दो साल कुछ महीने बीते जब से अचानक एक दहशत का सा माहौल दुनिया में कई जगह देखा गया  …वैक्सीन के आने और प्रयोग के बाद भी दहशत पूरी तरह से ख़त्म नहीं हुई…दूसरी के बाद तीसरी लहर की आशंका से हमारे यहां, जिस तेजी से आमजन ‘आतंकित’ हुआ… उसी तेजी से ‘लापरवाही’ के भी कीर्तिमान रच डाले…चेचक सरीखी महामारी के लगभग, पांच – छः दशक  बाद पिछले साल हमारी ही नई और पुरानी पीढ़ी का… किसी भी नये वाइरस को लेकर.. ज़रूरत से ज्यादा ‘हो हल्ला’ मचाना या चिंता करना इसीलिए  भी जायज सा लगा था क्योँकि कोरोना से कहीं हजार गुने  ख़तरनाक वाइरस हमारे दिल ओ दिमाग़… हमारी ‘लाइफ स्टाइल’ में गहरी जड़ें जमा चुके हैं…. तकनीक से हम सीखे या सचेत नहीं हुए… ग़ुलाम बन गए… इंटरनेट को ज़रूरत नहीं नशा बना लिया हमने… अपनी संस्कृति… अपने स्वच्छ… ईमानदार परिवेश से खुद को एकदम काट लिया…. और उलझते  ही गए लगातार…’त्वरित लाभ’… ‘तत्काल’ की सुविधाओं के मकड़जाल में… जहां बस सब कुछ…’पका पकाया’ सा… दिखाई देता है…कभी बड़े बड़े ‘झंझावात’ झेल चुकी पुरानी पीढ़ी के सामने आज की जनरेशन कहां…टिकती है जिसे एक अदना ‘कॉकरोच’ तक डरा जाता है…  संयुक्त… सुरक्षित परिवारों.. से अलग होकर आजादी महसूस करके बनावटी ख़ुशी दिखानेवाले ‘एकल परिवार’…गगनचुम्बी इमारतों की ऊपरी मंज़िलों पर.. महामारी सरीखी चुनौतियों से लड़ने की बजाए… उसका ‘हउआ’ बनाने और अपनी नवागत पीढ़ी को… प्रतिपल डराने क सिवा और कर भी क्या सकते हैं…

अपने मूल ‘परिवेश’ से…. अपनी ‘संस्कृति’ से कटेंगे  ‘जड़ों’ को ही काट डालेंगे…. तो खतरों से लड़ने का ‘माद्दा’ भला कहां से आएगा…

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