डॉ. गरिमा मिश्र “तोष”

अंग्रेजी साहित्य में एमए, लेकिन रचनात्मकता और मन के भावों को हिन्दी साहित्य में बखूबी व्यक्त करती हैं। शास्त्रीय संगीत गायन विधा में विशारद, कई किताबों का प्रकाशन एवं साहित्य के क्षेत्र में कई सम्मान प्राप्त।लगभग अठारह वर्षों से सतत रचनात्मक ,आध्यात्मिक आत्मिक एवं संबंधात्मक गतिविधियों एवं उन्नयन हेतु सेवारत।

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विश्वास

मनकही में इस दफे मैं विश्वास के विषय में जो जी कर जान पाई हूं वही सांझा करती हूं मेरे दृष्टिकोण से जीवन दर्शन का आधार है विश्वास एक विमोहित श्वास से संचालित हृदय की अनसुनी सी यात्रा का सबसे पुष्ट आधार है विश्वास जिसमें अनगिनत स्वप्न, आकांक्षाएं और कल्पनाएं पुनः पुनः जन्मति और मुक्त होती हैं,ठीक आती जाति सांसों सी और मोह भंग करती नवीनता से विमोह उत्पन्न कर वीतराग उपजा जीवन के असत्य को मृत्यु के सत्य से भेंट करवा मुमुक्ष बना देती है और वि – विमोह  श्वास सा विश्वास सृष्टि संचालन में एक असीमित ऊर्जा को परमेश्वर सा हमारे साथ कर देता है।

विश्वास मेरे लिए एक ऐसा सेतु है जो देह विदेह जरा मृत्यु के संस्कारित चक्रों और जन्मों से बंधा, सतत प्रवाहित निर्झर की ही भांति ब्रह्मांड के आदि अनंत रहस्यों से बहता हुआ भावनाओं में अश्रुधारों में ,आकांक्षाओं के टिमटिमाते तारों में स्थान घेरे रहता है ।

यूं कहूं कि विश्व की आस सा, विमोह की श्वास सा विश्वास बसता है सर्वत्र ।

यह विश्वास ही तो है कि घड़ी की सुई के ऊपर थमी जगत की गति को निर्धारित सीमा पर चलना रुकना और ठिठकना आता है और मानव ह्रदय स्वयं के हृदय की गतिविधियों को संशय में डाल, आते क्षण पर विश्वास ही तो जतलाता दिख पड़ता है,

विश्वास के स्वरूप में उगता हुआ सूरज ऊंचे उड़ते गगन में पंछी ,गहरी नदी में चमकते पत्थर पूर्णिमा के चंद्रमा की धुली चांदनी से सजा आकाश और ना बतलाए गए प्रेम को हृदय में धारण किए तापसी कोई भी हो किसी भी तरह से जुड़ा हो इस संसार में, जीवधारी हो या निर्जीव किसी ना किसी तरह से विश्वास आधारित ही है।

विश्वास को बड़े ही सूक्ष्म स्वरूप में यदि हम देखना चाहे तो ब्रह्मांड को संचालित करने वाली अदृश्य ऊर्जा का होना अणु अणु में बसती बहती शक्ति को धरने वाले हेतु का होना ही विश्वास है, जो शनैः शनै  संसार प्रकृति जीवधारियों आत्मिक संबंधों की जीवनी बन जाता है, बहुधा यह होता है कि जो सहज प्राप्त ऊर्जा होती है उसको सहेजना विस्मृत कर देता है मानव मन ठीक वैसा ही होता है विश्वास रूपी संपदा के विषय में सहज ही विश्वास यदि प्राप्त हो जाता है तो उसे सहेज नहीं पाता व्यक्ति बहुत ही आसानी से गंवा देता है क्योंकि उर्जा का क्षरण तो अवश्यंभावी है हालांकि ऊर्जा को क्षरित कर देने के पश्चात उसका पुनः सृजन यही तो प्रकृति का नियम है ।

विश्वास को यदि मैं देखती हूं तो धरती से आकाश पर जो अगाध स्नेह प्रेम दिखता है हर ऊष्मा अवधि के पश्चात जब धरा से वाष्प आकाश को पाती है तब जाकर उसी विश्वास से आकाश उस वाष्प के कणों को स्वयं में समाकर जल स्वरूप में पुनः धरा को समर्पित कर देता है यह विश्वास ही तो है कि जो दिया वह प्राप्त कर लिया और फिर पुनः दे दिया अखंड अमित प्रेम सहयोग ही विश्वास का गठन भी करता है विश्वास उसी सुदीर्घ प्रतीक्षा का भाव है जो शक्ति स्वरूपा उमा ने की थी शिव को प्राप्त करने की यह वही शक्ति की अवधारणा है कि जन्म जन्मांतर की सहयोग अग्नि वियोग को भस्म कर ही देती है ,विश्वास ही वह ऊर्जा है कि मीरा ने एक ही झटके में श्रीकृष्ण का स्मरण करके विश प्याला पी लिया था और वह यही भाव ज्वाला है जिसमें प्रहलाद स्वयं ही सुरक्षित हो गए थे किसी भी प्रकार के अनिष्ट से, मेरे लिए विश्वास ठीक उसी प्रकार के भाव का अतिरेक है जब किसी भटके पथिक को दूर टिमटिमाते आरात्रक की जगमगाहट या संध्याकाल में जलती आरत्रिका कि निशंक दमकती लौ को किसी भी प्रकार का भय नहीं होता कि वह धीमी भी हो सकती है ,हर पग पर सनातनता के मुक्ति का उद्घोष है विश्वास ,जिसको हम विश्व की आस भी कहते हैं ।किसी भी संबंध कार्य और संस्कार के विमोचन की श्वास है विश्वास ,हम जब भी मानवता के श्रेष्ठ भाव को चुनते हैं तब किनवा प्रथम है विश्वास ,फिर चाहे वह प्रेम हो समर्पण हो मित्रता हो, सेवा हो, विश्वास प्रथम दृष्टया सर्वाधिक आवश्यक हेतु है जो होना ही चाहिए नितांत सुखद दुखद परिस्थितियों में भी यही एक भाव है जो अक्षय  रहना चाहिए अतः विश्वास यदि मोह से परे का होता है तब दीर्घकालिक होता है।

मेरे जीवन में विश्वास की उपस्थिति सर्वत्र रही हां कभी मुझसे टूटा भी और मेरा विश्वास तोड़ा भी गया वस्तुस्थिति खंगालने पर यही जान पाई कि वह कहीं मध्य में रहा था तभी टूटा और तोड़ा गया अतः विमोहित होकर ही हम आस्था श्वास पाकर अपने इस ऊर्जा तत्व की रक्षा कर सकते हैं जिसको विश्वास कहा जाता है।

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