डॉ. गरिमा मिश्र “तोष”…

  ( अंग्रेजी साहित्य में एमए, लेकिन रचनात्मकता और मन के भावों को हिन्दी साहित्य में बखूबी व्यक्त करती हैं। शास्त्रीय संगीत गायन विधा में विशारद, कई किताबों का प्रकाशन एवं साहित्य के क्षेत्र में कई सम्मान प्राप्त।लगभग अठारह वर्षों से सतत रचनात्मक ,आध्यात्मिक आत्मिक एवं संबंधात्मक गतिविधियों एवं उन्नयन हेतु सेवारत।)

#साक्षी भाव, भागवत गीता में नवम अध्याय अट्ठाहरवें श्लोक गतिर्भरता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत, प्रभवः प्रलयः स्थनम निधानम बिजमव्ययम , अर्थात

 I’m the method,the nurisher,thelord,the witness,the abode,the good hearted(friend),the refuge,the origin,the dissolution,the sustenance,the repository,the imperishable seed of d world

 मैं ऋतु,कृतु,यज्ञ मैं, स्वधा मै (स्वधा देवी जी का वह नाम है जब हम यज्ञ करें तो पितृ समर्पण आहुति को लिया जाता है ,जैसे स्वाहा वैसे ही स्वधा) औषध मैं,मंत्र मैं, घृत मैं, अग्नि मैं,और हवन क्रिया भी मैं, वेद मै, ओंकार मैं, जगतपिता माता मैं,गति मैं,उत्पत्ति और प्रलय मैं, भर्ता,प्रभु, आश्रय, सुह्रद, स्थान भी मैं, प्रकृति निधान तथा अविनाशी बीज भी मैं

यदि आस्था और विश्वास के साथ आप इन सभी तत्वों में श्वास श्वास यह अनुभव करने और मानने का अभ्यास कर लेते हैं की सभी क्रिया प्रतिक्रिया,संबंध और उनका निर्वहन मात्र एक दृश्य है और हम दृष्टा, तो जीवन के आधारभूत नियमों को सरलता से समझा जा सकता है। साक्षी भाव पर अनगिनत विद्वानों प्रबुद्धजनों ने अपने अपने विचार प्रगट किए हैं जो सहज ग्राह्य हैं और पालन योग्य भी सर्वव्यापक हो कर ही आप स्व से मुक्त हो सकते हैं , मैं अपने साधारण से जीवन में जिन असाधारण परिस्थिति की साक्षी हूं उस आधार पर यह कह सकती हूं की यदि दृश्य के सत्य को दृष्टि आवाश्यक है तो दृष्टि के परिष्कार को सत्यता को विचार संवेदना सदाशयता आश्यक है,वही हमको दृष्टा कर सकता है और साक्षी भाव से न केवल परिचय करवा सकता है बल्कि सदैव साक्षी भाव में रहने का अभ्यास करवा सकता है।

बहुत छोटी आयु में मैंने जीवन की दो महत्त्वपूर्ण घटनाओं से जीवन और मृत्यु के छोटे से अंतर को समझा था और साक्षी भाव से प्रथम परिचय ले आज तक सीख ही रही हुं,पांच वर्ष की अल्पायु में ही एक वर्ष के कुछ माह के अंतराल से मैं जीवन को पुष्पित होते देख सकी अपने छोटे भ्राता के स्वरुप में,यह मेरा जीवन से परिचय थाऔर दूसरा परिचय मृत्यु से था मेरे छोटे चाचाजी का देहावसान अठारह वर्ष की अल्पायु में, उसी एक वर्ष में यह मेरा मृत्यु से परिचय था, मैने अनुभव किया था की जीवन की जीवंतता,क्या है और मृत्यु की शीतलता क्या होती है । मैं कितना परिवर्तित हुई यह तो अभी भी पता नही चलेगा क्योंकि परिवर्तन सतत दीर्घकालिक अवस्था को ही जांचा जा सकता है हां, बस इतना हुआ कि अपने आप से जुड़ते हुए मानव होने की सार्थकता का प्रथम सोपान तो बन ही गया, आगे चल कर विभिन्न परिस्थिति से होते हुए जब भी जीवन कोई प्रश्न या संदेश देता है तो यही जान पड़ता है क्रिया की प्रतिक्रिया ना रहना ही साक्षी भाव है,जैसे यदि किसी ने कुछ बुरा चाहा,कहा या सोचा तब भी आप उसको कोई प्रतिक्रिया ना दें ,हां यह कठिन है,पर जैसे की मैने स्वयं पर लागू कर इस सत्य को अनुभव किया है उसी के आधार पर कहती हूं साक्षी भाव से यदि हम रहने का अभ्यास कर लेते हैं तो जीवन कुछ सरल तो हो जायेगा एक और उदाहरण दूंगी जैसे किसी को कोई दारुण दुःख होता है अपमान का, एकांत का, मृत्यु का (कोई आत्मीय, स्वजन देहत्याग दें)तब यदि उनके दुःख को बांटने उनका कोई निकटवर्ती मित्र या संबंधी तत्काल प्रभाव से उसके समक्ष न उपस्थित हो पाए तो उस व्यक्ति की मनःस्थिति को आप उस नियत परिधि से संभाल सकते हैं प्रार्थना कर,भाव संप्रेषण कर, उस साक्षी भाव को आत्मसात् कर के हम दुःख को सांझा कर सकते हैं,वैसे ही सुख को भी सांझा किया जा सकता है परंतु हम यह सामर्थ्य को पुष्ट किए बिना कोई न कोई धारणा बना कर अगले व्यक्ति को भला बुरा कहने लगते हैं, अपनी ऊर्जा को नकारात्मक कर साक्ष्य मांगते हुए साक्षी भाव को बिसरा देते हैं।

साक्षी भाव का अभ्यास हमको न केवल भावनात्मक पुष्टता प्रदान करता है बल्कि आध्यात्मिक उन्नति दे कर संसार में रह कर संसार के सुखों दुखों की अनुभूति से परे कर आनंदित और संयत रहने में सहयोग करता है, सकारात्मक ऊर्जा को स्पन्दित कर शांति का आरोहण ही है साक्षी भाव अब प्रश्न यह है कि अपने आप में यह सामर्थ्य कैसे विकसित किया जाए,तो वह माध्यम है केवल और केवल अभ्यास ,संदेश भेजिए स्वयं को आत्म स्थित और स्थिरप्रज्ञ हो कर की जो भी है वह मैं हूं जो भी था वह मैं ही था और जो होगा वह मैं ही रहूंगा मैं एक आत्म स्थित विश्वास से भरा,ऊर्जावान तत्व हुं जिसको सत्य,प्रेम,शांति,सहयोग, सरलता,दया, क्षमा,प्रार्थना जैसे उच्च सोपान पर ही अपना स्थान बनाना है

 

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