डा. सुधा चैहानराज’…

परिचय 

पति- राजेन्द्र सिंह चैहान

शिक्षा– मनोविज्ञान, दर्शनशास्त्र व शिक्षाशास्त्र से स्नातक, इतिहास व संस्कृत से एम.ए., योगाचार्य, वेदाचार तथा  सनातन कर्मशास्त्र में डिप्लोमा, बाल मनोविज्ञान काउंसलर।

संप्रति- दस साल तक इंटर कालेज में पढ़ाने का अनुभव।

यात्रा-इंग्लैंड, अमेरिका, चाइना, जापान, नेपाल, व तिब्बत।

 संपादन-

जय महाकाल, सिंहस्थ, बुंदेली संस्कृति, छाया, राधे श्रंगार, दर्पण, गीतांजली, प्रेरणा, रणवीर, अभिरूचि, अनुभूति, काव्य-धारा, काव्यमंजरी, काव्यप्रदीप, खिलखिलाती धूप, लाॅकडाउन अनुभव अपने अपने, श्रीमहालेश्वर अष्टक, विश्वास, मंथन कलश, पेपर गुलदस्ता, सार्थक नव्या इंदौर विशेषंांक नासिक से।

साझा संकलन-

मेरे पापा, मा, कहानी-संग्रह, कविता-संगह, हम-पांच, चार अंगुल, रश्मि-कलश, जय-महाकाल, सीप में समुद्र, राही, काव्यरंग, गुलाब संग कांटे भी, काव्य-संगम, काव्य-सागर, कतरा-कतरा रोशनी, विराटांजली, सरस काव्य धारा, सिलवटें, काली कोठरी, नशा मुक्ति, काव्यधारा, अग्निशिखा काव्य धारा, सावन, गूंज, निर्भया, शक्तिस्वरूपा, मुस्कराती चोट, क्षितिज और भी हैं, मां, मेरी मां, मंथन, सतरंगी सपने, इन्द्रधनुष, नीला आकाश, सहित पचास साझा संकलन प्रकाशित।

प्रकाशित पुस्तकें –

1-‘‘बाल गीता’’ समय प्रकाशन दिल्ली 2012।

2-‘‘सर्वोच्च सफलता के सात कदम’’ दिशा प्रकाशन दिल्ली2015।

3-सुप्रसिद्ध एतिहासिक उपन्यास ‘‘महोबा’’ अंजुमन प्रकाशन 2017।

3-‘‘दुर्गासप्तसती हिन्दी काव्य खंड’’ 2015

4-बाल कहानी संग्रह ‘‘मित्रता की ताकत’, 2016

5-‘‘खरगोश की चतुराई, ‘बाल कविता संग्रह’, 2016

6- हिन्दी बाल पोथी- 2016 व

7- पूजा के फूल, क्रिएटिव विजन यू. एस. ए. से प्रकाशित।

8-‘‘शिक्षा एवं सुरक्षा’’ बालिकाओं को क्रिएटिव विजन यू. एस. ए.2018।

9– कैदी बचपन बाल कविता संग्रह 2020

10– बूंदों की तपन कविता संग्रह 2020

11-भोर की उजास उपन्यास, समय प्रकाशन दिल्ली से 2021।

12-महोबा के राजवंश- 2021 अंजुमन प्रकाशन इलाहाबाद

13- मध्यकालीन महोबा का वृहद इतिहास, अंजुुमन प्रकाशन से 2021

14-अट्ठारह सौ सत्तावन की अमर वीरांगना ये

बेवसाइट पर प्रकाशन – शब्दांकन, ई कल्पना, हिन्दी भाषा, हिन्दी डाॅट. काम, सहित कई बेवसाइट पर रचना प्रकाशित व पुरूस्कृत। लगभग अस्सी साझा संकलन में प्रकाशन। आकाशवाणी से लगातार प्रसारण।  यू ट्यूब व फेसबुक पर, वीडियो, आडियो द्वारा रचनाओं का प्रसारण।

अनुवाद- पुस्तक ‘बालगीता’ एवं ‘सर्वोच्च सफलता के सात कदम’ का अंग्रेजी अनुवाद सेनफ्रांसिसको अमेरिका में हुआ।

पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशन– वीणा, बुंदेली अर्चन, नारी-अस्मिता, लोक संस्कृति, हिचकी, राप्ट््र-प्रेम, साहित्य समीर, अदबी उड़ान, दर्पण, अर्पण-समर्पण, सोच-विचार, नारी अस्मिता, समावर्तन, आस्था, राजपुत्र, कथाबिंब, कथादेश, समय, शब्द सामयिकी, सहित  समाचार पत्र पत्रिकाओं तथा दैनिक न्यूज पेपर में लगातार प्रकाशन।  आकाशवाणी से प्रसारण।   चलचित्र के विज्ञापन भी लिखने का कार्य । फिल्म ‘‘अन्ना का आंदोलन’’ और ‘‘ लाइफ आफ अबाउट मी’’ का स्क्रिप्ट लेखन।

सक्रियता एवं पुरस्कार–

मध्यप्रदेश भाषा प्रचार प्रसार समीति भोपाल से पुरूस्कार सहित ‘‘हरकारा देवी सम्मान 2021। अवनि सृजन मंच से ‘‘लोक साहित्य गौरव सम्मान’’ 2021। मंजिल ग्रुप साहित्य मंच नई दिल्ली ‘‘बीर साहित्य शिरोमणि सम्मान’’ 2021, मातोश्री सम्मान।

मंजिल ग्रुप साहित्य ‘‘काव्यक्रांति अलंकरण’’ सम्मान, साहित्य सागर संस्था 2020। ‘‘गणतंत्र साहित्य गौरव सम्मान’’ मगसम दिल्ली 2020। महाप्रज्ञ कान्टेस वल्र्ड रिकार्ड से ‘‘द ब्रिटिश वल्ड रिकार्ड सार्टीफिकेट’’ 2020। अन्तराष्ट्रीय हिन्दी परिषद कोलकाता ‘‘शिक्षक गौरव सम्मान’’ व ‘‘करोना योद्धा सम्मान’’ 2020।

विश्व कवियत्री मंच दिल्ली से ‘‘हिन्दी सेवी’’ सम्मान 2019।

अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा से पुरूस्कार राशि सहित‘‘बीरांगना सम्मान’’ 2019।

विश्वपुस्तक दिवस पर सेन्ट्रल लाइब्रेरी इंदौर से सौरभ-सम्मान 2019।

साहित्य समीर भोपाल से ‘‘महादेवी वर्मा सम्मान’’ 2019।

काव्यसागर संस्था इंदौर से ‘‘ ‘‘लघुकथा भूषण सम्मान 2019,।

क्षितिज अखिल भारतीय लघुकथा सम्मेलन से ‘‘लघुकथा रत्न सम्मान’’ 2019।

लायनेस क्लब आफ इंदौर ‘‘साहित्य-रत्न सम्मान’’ 2019। ‘

‘अन्तराष्ट्रीय अग्नि शिखा मंच बाम्बे से  साहित्य-धारा’ सम्मान’’ 2019।

नाथद्वारा राजस्थान से ‘‘काव्य-कुसुम मानद उपाधि’’ 2018। बुंदेली विकास संस्थान छत…

अब तक 80 साझा संकलन प्रकाशित और विभिन्न संस्थाओं से करीब 100 सम्मान प्राप्त।

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आज हम स्वतंत्रता प्राप्ति का अमृत महोत्सव मना रहे हैं .हमे स्वतंत्र हुए आज 75  वर्ष व्यतीत हो चुके हैं। उसी उपलक्ष्य में हम 75  भारतीय वीरांगनाओं के बलिदान की गाथा लिख रहे हैं।मेरी आगामी पुस्तक है आजादी का अमृत महोत्सव और भारतीय वीरांगना उसी कड़ी में आप सभी से कुछ कहना चाहती हूं।

 हमें आजादी महिलाओं के संघर्ष के बिना मिल ही नहीं सकती थी

‘‘इस आजादी को पाने के लिए हमारे कई वीरो ने अपने प्राणों की आहुति दी, तो महिलाएं भी पीछे नहीं रहीं। सच कहें तो यह आजादी महिलाओं के संघर्ष के बिना मिल ही नहीं सकती थी।’’

इस संग्राम में महिलाओं ने तलवार और बंदूके थामकर अंग्रेजों से युद्ध ही नहीं किया बल्कि साम, दाम, दंड, भेद, छल, बल, कल, सभी प्रकार से क्रांतिकारियों का साथ देकर अंग्रेजो से लोहा लिया है। यह महिलाएं ही थीं, जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर हथियारों की सप्लाई करती थीं। कभी कचरे की टोकरी मे, कभी पैरों में बांधकर, साड़ी के नीचे ढंककर, कभी बच्चे को पीठ पर लादकर, तो कभी रातों को मीलों पैदल चलकर, डाकुओं के खेमे से भी, हथियार लाकर क्रांतिकारियों को मुहैया कराती थीं। रूपया पैसे, गोला-बारूद, रसद एकत्रित कर, क्रांतिकारियों के कैंप तक उन्हें किस तरह चोरी-चोरी पहुंचाना है, यह महिलाएं बखूबी जानती थीं। ‘‘स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने वाली महिलाओं की संख्या, गांवों से लेकर शहरों तक करीब बीस लाख थी। करीब दस लाख महिलाएं तो विभिन्न क्षेत्रों से पूरे भारत में सक्रिय होकर, आंदोलनकारियों का सहयोग कर रही थीं। सच कहा जाए तो आंदोलन की धुरी यह महिलायें ही थीं।’’

इन्होंने अंग्रेजों के हर अत्याचार का सामना वीरता पूर्वक किया है। ये आजादी की दीवानी, हंसते-हंसते मौत को गले लगाती थीं। गोली की ठांय ठांय और लहू की बहती धारा देखकर, तनिक भी विचलित नहीं होती थी बल्कि और दृढ़ संकल्पित होकर दुर्गा, काली, चंडी बनकर अंग्रेजों का समाना करने को तत्पर हो जातीं थीं। ‘‘1930 से 1933  के दौरान करीब डेढ़ लाख लोगों को कठिन कारावास की सजा मिली थी, उसमें एक लाख महिलायें थीं। यह आंकड़ा महिलाओं की भागीदारी को दर्शाता है।’’

कहावत है ‘‘जहां ना जाये रवि, वहां जाये कवि’। ठीक उसी तरह महिलायें वो असंभव कार्य भी करतीं थीं, जो पुरूष नहीं कर पाते थे। इतिहास पढ़ने पर पता चलता है, अगर ये महिलाये ना होती तो इतनी जल्दी आजादी नहीं मिल पाती। ‘‘आजादी का प्रथम बिगुल बजाने वाली और पुरूषों के दिलों में आजादी की मशाल जलाने वाली, महिलायें ही थीं। चाहे वह रानी लक्ष्मी बाई हो, रानी अवन्ती बाई, रानी ईश्वरी देवी, रानी चेनम्मा, रानी सावित्री चैहान, देवकी रानी, रानी सुमति देवी या फिर मैना रानी ही क्यों ना हो ।’’

इन वीरांगनाओं ने जिस तरीके से आश्चर्यजनक कारनामे किये हैं, उन्हें लिखा जाए तो एक बड़ा ग्रंथ तैयार हो जाए। इन्होंनें मां, बहन, बेटी और जरूरत पड़ी तो नकली पत्नी बनकर भी साथ दिया है। दुर्गा भाभी ने सुभाष, भगत सिंह की पत्नी बनकर, उन्हें अंग्रेजों से बचाया। जमुना देवी ने सूर्यसेन बोस की पत्नी बनकर मदद की।  आठवीं की स्टूडेन्ट शांति घोष, सुधा घोष, ने लॉर्ड हडसन पर सामने से गोली चलाकर मौत के घाट उतारा था। धन्य हैं! वो जिन्होंने अपने गणवेश पर अंग्रेजी मोनो लगाने से इंकार कर दिया और यातनायें सहीं थीं। क्रांतिकारियों का सहयोग करने पर 12 महिलाओं को एक लाइन में खड़ा करके गोली से भून दिया था।

वह भारत की नारी थी, जो इतना वीभत्स नजारा देखकर भी, मन में भय नहीं खाती थी, बल्कि उसके अंदर विद्रोह की ज्वाला, बहते लहू को देखकर और भड़क जाती। वह जोर-शोर से रणचंडी बनकर, आंखों में शोला लेकर अंग्रेजों पर टूट पड़ने के लिए बेताब हो जाती और फिर एक नई योजना बुनकर अंग्रेजों के दांत खट्टे कर देती, तो कहीं सुभद्रा कुमारी बन गीतों में वीर रस घोलकर, अंग्रेजों को ललकारती। ‘‘यह हकीकत है कि यह वीर महिलायें सहयोगी नहीं होतीं, तो भारत की आजादी का सपना कभी पूरा नहीं होता।

रानी के लिए सर ह्यूरोज ने लिखा -‘‘रानी लक्ष्मीबाई क्रांतिकारियों में सबसे वीर और कुशल सेनापति थीं। लॉर्ड डलहौजी ने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए कहा था- ‘‘राज्य की संपूर्ण सैन्य शक्ति मिलाकर भी महारानी झिंदा की शक्ति से मुकाबला नहीं हैं। ‘‘सर रसेल ने लंदन टाइम्स में लिखा- ‘‘भारत की रानियां और महिलाओं को देखकर विचार आता है कि महलों में ऐसो आराम का जीवन बिताने के बावजूद भी वह, इतनी बौद्धिक और शारीरिक शक्ति उत्पन्न कर लेती हैं कि उनसे टकराना असंभव हो जाता था।’’ उत्तर प्रदेश के गवर्नर मैहर फोर्ट टेलर ने 1916  में लार्ड हार्डिंग को एक पत्र में लिखा- ‘‘मुझे राजनीतिज्ञों से उतना भय नहीं लगता, जितना भारत की महिलाओं और धार्मिक नेताओं से है। वाटसन – ‘‘जिस देश की महिलाएं इतनी जांबाज और खतरनाक हों, वहां अंग्रेजों का शासन, मात्र कुछ गद्दारों की नमक हरामी पर टिका है।

सर डबल्यू. एच. रसेल ने कहा- ‘‘मैना में गजब की शक्ति और आत्म विश्वास था। हमसे युद्ध की घोषणा पर वह कायम रही और हंसतें हुए अग्नि में समा गयीं। मैं उनकी वीरता को सलाम करता हूं।’’ सर मैलकम हैली ने सेंट्रल असेंबली में एक अभियोग पत्र पढ़कर कहा-‘‘भारत की महिलायें अप्रत्याशित तरीके से गोला-बारूद, हथियार, चंदा इकट्ठा करती हैं और उनसे अंग्रेजों से लड़ती हैं।’’

महात्मा गांधी कहते थे- ‘‘राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास भारत की महिलाओं के उल्लेख के बिना पूर्ण नहीं हो सकता। इसलिए मैं उनके सहयोग को नमन करता हूं।’’ रियाज अहमद ने अपने शोध में कहा है- भारत की स्वतंत्रता में महिलाओं की उल्लेखनीय भागीदारी है, राष्ट्रीय संघर्ष की कहानी तब तक अपूर्ण रहेगी जब तक इन वीरांगनाओं के त्याग का उल्लेख ना हो।

पी दस्तूर – ‘‘सरोजिनी हर प्रकार से एक पूर्ण महिला थीं, उन्होंने देश के इतिहास में जो भूमिका निभायी, बहुत कम पुरुष ही उसे निभा पाते हैं। बंकिम चंद्र ने सरदारनी देवी पर पूरा उपन्यास ही लिख डाला है। आज मुझे इनका इतिहास लिखते हुए बहुत गर्व हो रहा है। मैने ज्यादातर उन पर लिखा है, जिनका नाम सामने नहीं आया है। आशा है कि मेरी पहले की पुस्तकों की तरह, यह पुस्तक भी आप सभी को इतिहास की जानकारी कराने में लाभकारी होगी।

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