डॉ. चंद्रा सायता

लघुकथा

एक साहित्यिक कार्यक्रम की प्रकाशित रिपोर्ट को वाट्सएप पर फारवर्ड किया गया।यही रिपोर्ट समूह दर समूह वायरल होती रही । मि. रतनलाल की निगाहों में भी वह रिपोर्ट आ गई।

रिपोर्ट पढ़ते-पढ़ते रतनलाल की दृष्टि अचानक थम गई और जुबान ने अपना काम शुरू कर दिया…

” अरे। यह जग्गू कब से साहित्यकार बन गया, वो भी  नगर का वरिष्ठ साहित्यकार!”

समाचार इतना वायरल हो चला था कि बैठे – बिठाए  वाट्सएप पर दो समूह बन गए और घमासान चैट शुरू हो गई।

एक समूह था जिसे  तथाकथित “जग्गू” को साहित्यकार मानना गंवारा न था, क्योंकि वह इस सयूह के साहित्यकारों के सामने ही मंच पर फूहड़ अधकचरी कविताएं सुनाया करता था और दर्शक उसका मजाक बनाया करते थे।इस बात को कोई ज्यादा समय नहीं हुआ।

इस बात में झूठ की रत्ती भर भी गुंजाइश न थी कि आयु से वह वरिष्ठ था, पर साहित्य की उसे जरा भी सयझ नहीं थी।  भला.हो प्रिंट मीडिया का जिसने इस पर कभी गौर नहीं किया।शायद समाचार किसी गणमान्य व्यक्ति की पहुँच के माध्यम से उन तक पहुंचता था।

इस चैट- युद्द के दौरान अचानक किसी सज्जन की  एक पोस्ट दिखाई दी।

” अरे भाई साहब।आप या आपका विपक्ष कोई भी यदि यह बताने का कष्ट करे कि एक साहित्यकार के क्या – क्या मानदण्ड होते. हैं,तभी मैं साहित्यकार बनने का प्रयास करूं।मैं नहीं चाहता कि मेरे नाम पर.भी ऐसा बबाल हो।”

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