रश्मि सक्सेना,

रश्मि सक्सेना

शिक्षा – एम. ए. (अर्थशास्त्र)

सम्मान – दोहा रत्न सम्मान, ग़ज़ल साम्राज्ञी सम्मान, साहित्य सृजक सम्मान, काव्य सुधा सम्मान, मुक्तक गौरव सम्मान, नवोदित साहित्यकार सम्मान , कबीर-तुलसी सम्मान

प्रकाशित संग्रह – 1. मैं रहूँ या न रहूँ भारत ये रहना चाहिये , 2. अंगदान महादान , 3. अधूरी ग़ज़ल , 4. साहिल की तलाश , 5. मुक्तक मंजूषा , 6. ग़ज़ल गंगा , 7. भावों का आकाश

उपलब्धि – कवि-सम्मेलनों में शिरकत,देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में रचना प्रकाशित

ईमेल – rashmisaxena626@gmail.com

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  हरियाली ही खुशहाली है

आप सबने देखा होगा कि कभी जब हमारा मन खराब या उदास हो , उस समय अगर हम ऐसी जगह बैठ जाएँ जहाँ पर चारों तरफ पेड़ पौधे और फूल हों तो हमारा मन कितना अच्छा महसूस करने लगता है । कितना सुकून मिलता है ।

लेकिन विकास के नाम पर आजकल जंगल के जंगल कट रहे हैं । शहरों में भी असली पेड़ों को उजाड़ कर कृत्रिम पेड़ लगाए जा रहे हैं जिसका स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है । एक बात मुझे समझ में नहीं आती कि पहले तो विकास के नाम पर बड़े-बड़े पेड़ों की बलि दे दी जाती है और फिर उसके एवज में कहीं और वृक्षारोपण कर दिया जाता है । जिनसे भरपूर ऑक्सीजन मिल रही थी उन्हें तो काट दिया गया तथा जो पौधे लगाए गए उनका भी ठीक से रख-रखाव न होने से उनमें से कितने पौधे मर जाते हैं । चलिए कुछ ने धीरे-धीरे पेड़ का रुप ले भी लिया तो वही पेड़ फिर विकास के नाम पर फिर काट दिए जायेंगे ।  यह सब क्या सही है ?

अगर मैं अपनी बात करूँ तो मुझे हरियाली के बीच रहने में बहुत खुशी मिलती है । मैंने अपने घर के आँगन में , बालकनी में , छत पर बहुत सारे गमले लगा रखे हैं । घर के अंदर हॉल में , कमरों में ऐसे प्लांट रख रखे हैं जो भरपूर ऑक्सीजन देते हैं ।

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