लेखिका :- रंजना फतेहपुरकर

प्रकाशन :-HSRA PUBLICATION

मूल्य :- 150 /-

मो नंबर :-9893034331

एक वीरांगना  की गौरव गाथा

वरिष्ठ साहित्यकार रंजना फतेहपुरकर का  ओजपूर्ण उपन्यास”मैं अहिल्या हूँ” में मध्यप्रदेश ,खासकर महेश्वर के उस स्वर्णिम इतिहास का साक्षात्कार हुआ जिसमें देवीतुल्य अहिल्या की वीरगाथा पगी-बसी है।

रंजना स्वयं भी इस राजसी परिवार से ताल्लुक रखती हैं , राजपरिवार के प्रति पूरा सम्मान रखते हुये सिलसिलेवार तरीके से भारत भूमि की महान वीरांगना अहिल्याबाई का जीवन चित्र प्रस्तुत किया है। जो पाठक अहिल्याबाई के जीवन सार से इतना वाकिफ नहीं रहे, उनके लिए यह उपन्यास मील का पत्थर साबित होगा।

अहिल्या के जन्म से लेकर उनके अवसान तक जीवन के हर दंद्ध, लय, वाद, प्रतिवाद, सुर, ताल को यहाँ बेहद बारीकी से कलमबद्ध किया गया है। वर्णन इतना सूक्ष्म है कि अक्सर पाठक को यह भान होता है कि वह स्वयं उसी काल खंड का हिस्सा है।

इतिहास के पन्नों को पलटना अक्सर सुखकर नहीं हो पाता क्योंकि उसमें इति की पीड़ा भी समाहित रहती है। वरिष्ठ पत्रकार एंव इतिहासकार श्री घनश्याम होलकर जी ने अपनी भूमिका में “होलकर वंश” की इस वीरांगना को अद्वितीय सम्मान देते हुये बहुत ही परिष्कृत एंव सारगर्भित विवेचना की है।

इस किताब को पढ़ते समय अहिल्या का आलौकिक पक्ष बड़ी मजबूती से प्रस्तुत होता है। बुद्धिमता का गुण जो एक कुशल संचालक में उपलब्ध होना चाहिए, वह बचपन से ही दृषिटगोचर हो रहा था। अहिल्या शिव जी की परम भक्त थीं और यह संदर्भ यत्र-तत्र इस किताब में उल्लेखित है।

” जिस शिवलिंग का निर्माण मेरे हाथों हुआ था और उसकी रक्षा की जिम्मेदारी भी मेरी ही थी।””यदि मेरे चले जाने से शिवलिंग खंडित हो जाता तो मैं अपने आप को कभी माफ नहीं कर पाती।”कठिन परिस्थिति में स्वयं निर्णय लेने का गुण शायद यहीं से आया था।

लेखिका ने अहिल्या के जीवन के लगभग सभी पक्ष रखे हैं। आम जन की तरह अपनी गाय की संभाल, उसके चारा-पानी की चिंता से लेकर रसोई पकाने का भी गुण उनमें दिखाये गए हैं। देखा जाए तो इन सारे गुणों का वर्णन एक और सीख भी देती है कि परिस्थिति के अनूकूल आपको हर काम की सूझ होनी चाहिए ताकि वक्त की कठिनाई कोई प्रतिकूल असर न डाल सके।

हांलांकि, अपनों को खोने का जो सिलसिला चला, उससे ज्यादा कठिन और असहनीय और क्या वक्त हो सकता है। शायह इसी अति ने अहिल्या को इतना मांज दिया कि वे इतने बड़े राज्य की प्रशासनिक ,वैचारिक, सामाजिक हर क्षेत्र में समान अधिकार से अभूतपूर्व निर्णय लेने में सक्षम रहीं। अपनी जनता के प्रति उनके सद्कार्यों का जो विस्तृत वर्णन इस किताब में पढ़ने को मिला ,उससे स्वतः इस वीरांगना के लिए सर श्रृद्धा से झुक जाता है।

भारत और खासकर मध्यप्रदेश की राजनीति और सामाजिक परिदृश्य और अहिल्याबाई एक दूसरे का पर्याय बन गये थे। “मैं अहिल्या हूँ” में इतिहास के उन अनछुए पहलुओं से साक्षात्कार किया जिनके सफहों को अब तक मैं खोल ही नहीं पाई थी।

लेखिका जो स्वयं होलकर राजपरिवार से ताल्लुक रखती हैं, उन्होंने बड़ी ही बारीकी से हर घटना का अवलोकन किया है। इतिहास के ऐसे पन्नों को छूना जो समय की गर्त में दब से गये हैं, श्रमसाध्य और गहरा अवलोकन चाहता है। साथ ही बेहद इत्मिनान भी।

“मैं अहिल्या हूँ”को पढ़ना एक रोमांचित कर देने वाला अनुभव था क्योंकि यह विगत की अतुलनीय उर्जा और अपार गौरव को सजीव कर रहा था। इस किताब को उसी तारतम्यता से पढ़े और जिए उस वक्त को।

माँ अहिल्या को पूरे आदर से नमन करते हुये यह कहूँगी कि अपने सुनहरे इतिहास से साक्षात्कार जरूर करे। यह किताब अपने नाम की ही तरह उच्चता के सर्वोच्च शिखर पर बैठे ,ऐसी शुभऐच्छा करते हुये।

समीक्षक :-  अंजू निगम

नई दिल्ली

मो. नंबर :- 9479377968,  7999929636

2 Comments

  • अजीत सक्सेना, June 23, 2022 @ 5:21 am Reply

    समीक्षा पढ़ कर पुस्तक पढ़ने को मन लालायित हो उठा। अनेकों शुभकामनाएं।

  • Suresh Raikwar, June 23, 2022 @ 10:11 am Reply

    इतनी सटीक समीक्षा है की पुस्तक पढ़ने की तीव्र इच्छा जागृत हो गई। बधाई लेखिका और समीक्षक आदरणीय अंजू जी को।

Leave a Reply

Your email address will not be published.