पुस्तक समीक्षा:  चिया

(लघुकथा संग्रह-सुषमा दुबे )

साहित्यकार सुषमा दुबे की प्रथम लघुकथा संग्रह “चिया” कोमल भावों का ताना-बाना बुनती उत्कृष्ट रचनाओं का संग्रह है। ये संग्रह सुषमा के हृदय की सहजता तथा सामाजिक वातावरण का सूक्ष्म मंथन है ,जो कि पुस्तक के शीर्षक से ही स्पष्ट हो जाता है ।

शीर्षक को सार्थक करता पुस्तक का मुखपृष्ठ बचपन की अठखेलियां करता, यादों का पिटारा खोल देता है । पुस्तक के पन्नों को पलटते ही कहानियों के गलियारों में जीवन के विविध रास्तों से गुजरते विषय और उसमें गूँथे कथानक हमारे आसपास होती सहज घटनाओं की बरबस याद दिला देती है । सहज, सरल, अपनेपन के भावों से भरे सुंदर शब्दों से बंधी कहानियाँ, विविध आयामों को छूती हुई “चिया” पुस्तक के स्वरूप को सार्थकता प्रदान करती है । कलम के रास्ते लगभग हर विषय को चुनते हुए आगे बढ़ी हैं ।

फिर चाहे “नन्ही कोपल” के रूप में पर्यावरण पर चिंता हो, मां की उपेक्षा करते बच्चे हो, बेटे -बेटी के भेद करती सामाजिक विसंगति, पति के बीच ईगो, हिंदी भाषा के प्रति समर्पण, रिमोट वाली डाल के रूप में लड़की होने का दर्द, पति-पत्नी की नोक -झोंक, रक्तदान को प्रोत्साहित करती लघुकथा व कन्या भ्रूण हत्या जैसे संवेदनशील विषयों पर भी आपने प्रमुखता से कलम चलाई है ।

हमारे आस पास होती सामान्य घटनाओं को सूक्ष्मता से अवलोकन करना लेखिका के सरल व्यक्तित्व का प्रमाण है । लघु कथा के मापदंड पर खरी उतरती उनकी लघु कथाएं अंत तक पाठकों के मन में जिज्ञासा बनाए रखने  में सफल है, साथ ही पाठकों के मन में प्रश्न चिन्ह खड़ा कर देती है । लगभग सभी कहानियों के शीर्षक अपने कथानक को सार्थक कर रहे हैं ।

मनोवैज्ञानिक रूप से “चिया” पाठक के हृदय को अवश्य आनंदित व आंदोलित करेगी ।

सुख- दुख की मिली-जुली जीवन शैली में “चिया” की लघुकथाएं हमारी अपनी सी कहानी लगती है । निश्चय ही सुषमा की प्रथम कृति लघुकथा संग्रह “चिया” अवश्य पसंद की जाएगी ।लेखिका के सृजनशील प्रयास के लिए हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं ।

समीक्षक : अर्चना मंडलोई

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