कोरोना काल की यदि त्रासदियों को भुला दिया जाए तो कई ऐसी नई विधाएं हमारी जिंदगी में शामिल हुईं जिनके बारे में शायद इसके पहले सोचा नहीं जा सकता था। महामारी के दौरान परिवार के सदस्य घर में बंद जरूर हो गए, किंतु रचनात्मक प्रवृत्ति के लोगों ने उस दौर में भी अपनी सृजनात्मक रुचियों को जीवंत रखा। उसी दौर में शुरू हुआ ऑनलाइन गतिविधियों का सिलसिला जो अब तक जारी है। साहित्य के क्षेत्र की बात करें तो अनगिनत लेखनी चलने लगी।इसी के मद्देनजर यह बात भी निकल कर आई कि ऑनलाइन होने वाले इन कार्यक्रमों में पाठकों की रुचि कितनी रही…या अभी भी है। यह जाना ऑनलाइन साहित्यिक गतिविधियों में शामिल रही लेखिकाओं से …..।

(प्रस्तुति- संध्या रायचौधरी)

ऑफलाइन कार्यक्रमों में हमारी उपस्थिति प्रभावकारी होती है.

अनुराधा मिश्रा

ऑनलाइन मीडिया पर होने वाले साहित्यिक कार्यक्रम आम जनता के लिए समयानुसार रुचिकर भले ही हों,लेकिन वास्तविकता तो ये है कि,इस तरह के कार्यक्रम ठीक उस तरह के होते हैं जैसे किसी भूखे इंसान को भोजन में खिचड़ी मिल जाए और वो ये समझ कर खा ले कि भूखे रहने से तो अच्छा है कि खिचड़ी से ही पेट भर लिया जाए और हां खिचड़ी सेहत के लिए भी तो अच्छी है.

लेकिन साहित्यिक कार्यक्रम प्रत्यक्ष रूप में आयोजित किए जाने पर पारस्परिक संवाद ,अनुशासन के साथ ही व्यक्ति की उपस्थिति से जीवंत हो उठते हैं.हम आमने सामने बैठकर साहित्यिक परिचर्चा करते हैं तो हमारे हावभाव और आवाज का उतार चढ़ाव हमारी सशरीर उपस्थिति ,हमारे विचारों को प्रभावशाली बनाती है.जबकि ऑनलाइन कार्यक्रम में सभी को म्यूट करके एक वक्ता को बोलने का अवसर मिलता है तो वक्तव्य की गतिशीलता पर असर पड़ता है.भले ही लोग ऑनलाइन कार्यक्रमों को समय और स्थान की बचत से जोड़ें, परंतु ऑफलाइन कार्यक्रमों में हमारी उपस्थिति प्रभावकारी होती है.

देश-विदेश के रचनाकारों का एकसाथ जुडना रुचिकर है

आशा जाकड़

सोशल मीडिया पर होने वाले ऑनलाइन कार्यक्रम लॉक डाउन की ही देन है l न लॉक डाउनलोड होता ,न लोग ऑनलाइन कार्यक्रम करने की तरफ अग्रसर होते। ऑनलाइन कार्यक्रम ने लोगों को नया जीवनदान दिया है जिससे साहित्य कार्यक्रम बड़े ही रुचिकर प्रतीत हो रहे हैं ।लोगों का साहित्य के प्रति जो रुझान खो गया था आज ऑनलाइन से फिर वापस लौट रहा है जो लोग लिखते- पढ़ते नहीं थे अब व्हाट्सएप पर खूब लिखने और पढ़ने भी लगे। हैं जो लोग गाते नहीं थे , वे गाने भी लगे हैं । आज ऑनलाइन कार्यक्रम हम सब के लिए एक सकारात्मक दिशा है ।  व्हाट्सएप पर अनगिनत साहित्यिक संस्थाएं बन गई हैं जो नये- नये विषय देकर रचनाओं का सृजन करवा रहे हैं। रचनाकारों को सम्मान पत्र देकर लेखन की ओर जागरूक कर रहे है,l साहित्य की नई गतिविधियों से पूरे देश के लोग  पटल पर एकसाथ जुड़े हैं।  हाउसवाइफ भी  साहित्य में रुचि लेने लगी है ऑडियो- वीडियो बनाना सीख सीख गई है जिससे उनमें आत्मविश्वास की भावना आ गई है।  लाइव कार्यक्रम  से साहित्यकारों को मंच पर बोलने की कला विकसित हो रही है। ऑनलाइन कार्यक्रम  रुचिकर हो रहे हैं जिससे वातावरण बड़ा ही सुन्दर ,स्वस्थ और मुखरित हो रहा है।

आभासी संपर्क रहा, किंतु प्रत्यक्ष की अनुभूति अलग होती है

अर्चना मंडलोई

पिछले दो वर्ष में  सामान्य जीवन में अनेक बदलाव आए हैं।महामारी का  दौर जहाँ दुखद रहा ,वहीं कुछ आवश्यक बदलाव सुखद भी रहे हैं। उन्हीं में डिजिटल प्रणाली भी है जिसका भरपूर उपयोग इस दौर में हुआ है। किसी भी परिस्थिति में विचार और रचनाधर्मिता नहीं रुकती है यह बात विकट परिस्थितियों में सिद्ध हो चुकी है। ऑनलाइन कार्यक्रम  विकल्प रूप में बेहतर हो सकता है।ऑनलाइन कार्यक्रम में आम पाठक जुड तो जाता हैं,किन्तु वक्ता के प्रत्यक्ष न होने से वो आनंद की अनुभूति वह नहीं कर पाता। ऑनलाइन कार्यक्रम में व्यक्ति कार्यक्रम की गरिमा वहाँ माहौल से अपने आप को नहीं जोडता, क्योंकि वह उस वक्त घर ,आँफिस या अन्य स्थान पर होता है जहाँ वह अन्य कार्य भी कर रहा होता है।ऐसी स्थिति में साहित्यिक विषय का आनंंद पूर्ण रूप से नहीं उठा पाता।बहरहाल डिजिटल विकल्प के रूप में उत्कृष्ट माध्यम है।जिसने महामारी के दौर में हमें एकदूसरे से आभासी रूप से सम्पर्क में रखा है।

अंधेरे में किरण की तरह हैं ऑनलाइन कार्यक्रम

विनीता मोटलानी

वर्तमान परिस्थितियों में सोशल मीडिया एक सशक्त माध्यम बनकर उभरा है। कोरोनाकाल के दौरान लोग काफी समय तक घरों में कैद रहे। इस दौरान ऑनलाइन साहित्यिक गतिविधियां चलती रहीं ।जिससे कम से कम इस दौर से बाहर उबरने में कुछ मदद मिली। साहित्य से रुचि रखने वाले लोगों के लिए यह एक अंधेरे में किरण की तरह था।

एक बात की तरफ ध्यान आकर्षित करना चाहूंगी कि ऑनलाइन साहित्यिक कार्यक्रमों में कई बार ऐसा भी देखने में आया है कि जो भाग ले रहा होता है वह स्वरचित रचना पढ़ रहा है या किसी और की इस बात की गारंटी नहीं रहती है । चूंकि प्रिंट रचनाएं आम पाठकों तक भी पहुंचती हैं और ऑनलाइन कार्यक्रम में जिसे लिंक भेजी जाती है सिर्फ वही जुड़ पाते हैं इसलिए कई बार अयोग्य व्यक्ति भी साहित्यिक गतिविधियों में संलग्न हो जाता है जो कि साहित्य की हानि है ।इसलिए कुछ बातों का अगर ध्यान रखा जाए तो इस पाबंदियों वाले दौर में कम से कम यह एक सुख कर पहल है ।

मेल-मिलाप का  अच्छा जरिया हैं ऑनलाइन इवेंट्स

डॉक्टर रजनी भंडारी

आज कल तो ऑनलाइन कार्यक्रमों की बाढ़ सी आई हुई है, कारण कोरोना ने सबको ख़ाली समय भी दिया और अकेलापन भी दिया । रुचि होना या रुचिकर होने में अंतर तो होता ही है परंतु ये साहित्यिक प्रोग्राम कई छुपी हुई प्रतिभाओं को उजागर भी कर देते है कभी- कभी इन में भागीदारी करने वाले दर्शक और प्रतिभागी अपने अपने पसंद के अनुसार ही अपनी रुचि को तलाशते हैं । मेरा मानना है कि आम नागरिक तो कुछ न कुछ पाता ही है अच्छे शब्द , सुंदर भाव सुनकर मन प्रसन्न तो होता है समय भी पास हो जाता है। श्रेष्ठता की तलाश नहीं होनी चाहिए , मेल मिलाप का ज़रिया  हैं इस तरह के ऑनलाइन इवेंट्स।  कुछ न करने से तो अच्छा ही है कुछ करना और अगर वह साहित्यिक हो तो सोने पे सुहागा हो जाता है.

साहित्य के नाम पर आत्म- अभिव्यक्ति है

विनीता तिवारी

ऑनलाइन होने वाले साहित्यिक कार्यक्रम के लिए तो ,साहित्य में रुचि रखने वाले जन के समूह बने होते हैं।इसमें आमजन का जब इंवॉल्वमेंट है ही नहीं तो रुचि का प्रश्न ही कहां है? समूह के अलावा भी यदि कोई साहित्य के नाम पर कुछ परोसता है, तो वह सिर्फ आत्म अभिव्यक्ति ही है।  इस अभिव्यक्ति में आमजन को सिर्फ भाव ही नजर आते हैं और तथाकथित साहित्यकार आम पाठकों की टिप्पणी से भ्रमित हो जाता है ।सही मायने में साहित्य तो कालजयी है!

ऑनलाइन से समय की काफी बचत होती है

वाणी अमित जोशी

आम पाठक के लिए ऑनलाइन हो रहे साहित्यिक कार्यक्रम इसलिए रुचिकर हैं क्योंकि इसमें समय सबसे महत्वपूर्ण है।  माना जाता है कि समय ही धन है (टाइम इज मनी)। तो साहित्यिक कार्यक्रम में आने-जाने में जो समय लगता है, वो बचता है। दूसरी महत्वपूर्ण बात है, ‘कपड़ों का चुनाव’ हम क्या पहनने वाले हैं। सबसे पहले घर से बाहर निकलने में होने वाली तैयारियों में कपड़ों का चुनाव ही प्रमुख है।

क्योंकि यहां पर बात हो रही है, आम पाठक  की तो यूं मंच पर होने वाली किसी भी प्रकार की गतिविधियों से उनका कोई लेना देना नहीं। वे केवल साहित्य सुनने और समझने के लिए आते हैं, तो वे तकनीकी सुविधा से म्यूट एवं वीडियो ऑफ वाला ऑप्शन का उपयोग करके अपने अन्य महत्वपूर्ण कार्य करते हुए भी इन कार्यक्रम से लाभान्वित हो सकते हैं।

 

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