भोपाल.इंडिया डेटलाइन. क्या नया संसद भवन विदिशा के बीजा मंडल (विजय मंदिर) की डिजाइन पर बनाया जा रहा है? यह तो इसके वास्तुकार बिमल पटेल ही बता पाएँगे लेकिन दोनों की संरचना में साम्य है इसलिए यह अनुमान लगाया जा रहा है कि इसकी संरचना को ध्यान में रखा गया। वास्तुविद कहते हैं कि यह त्रिकोणात्मक संरचना भारतीय वास्तुकला का अंग है। 

बीजा मंडल की नए संसद भवन की आकृति से मेल दिखाने वाली तस्वीरें सोश्यल मीडिया पर चल रही थीं लेकिन आज अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी रायटर द्वारा ट्वीट करने के बाद यह राष्ट्रीय मीडिया का विषय भी बन गया। विजय मंदिर भोपाल से साठ किमी दूर विदिशा जिला मुख्यालय पर एक प्राचीन विशाल मंदिर था जिसे इलतुतमिश के मालवा पर ईसवी सन 1235 में हुए भीषण हमले के दौरान नष्ट किया गया था। बाद में यहाँ औरंगज़ेब के मस्जिद बनाने के स्फुट संदर्भ भी मिलते हैं। ग्यारहवी सदी में तत्कालीन लेखक मिन्हाज सिराज ने ‘सबकाते नासरी’ में विदिशा पर हुए हमले का ब्योरा दिया है। 

संसद भवन व मुरैना जिले के मिताली का चौंसठ योगिनी मंदिर

विजय मंदिर राजा भोज की तीसरी पीढ़ी के नरवर्मन ने बनवाया था। इसके 120 गज यानी एक हजार 80 फीट ऊँचे होने का उल्लेख मिलता है। किन्तु समय के साथ यह ध्वस्त मंदिर निर्माणों व मिट्टी की परतों में दब गया। नब्बे के दशक में इसके ऊपर बनी एक दीवार के गिरने से नींव व कुछ निर्माण और मूर्तियाँ बाहर दिखने लगीं जिसके बाद लोगों ने अन्य दीवारों भी तोड़कर पूरा निर्माण बाहर निकाला। इसके बाद इसका पूरा प्रांगण निकालने और उसके संरक्षण का कम चला। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के तत्कालीन मप्र सर्किल प्रमुख केके मोहम्मद ने इसके पुनरुद्धार का काम शुरू किया। आज इसे लोग बीजा मंडल के नाम से जानते हैं। 

पुरा साहित्य के अध्येता व विदिशा जिले के ही निवासी विजय मनोहर तिवारी कहते हैं कि कई मंदिरों का स्थापत्य उनके हज़ार साल तक अस्तित्व में रहने की संभावनाओं को  दृष्टिगत रखकर तय किया गया। नौंवी सदी के मंदिर आज भी भले ही जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हों, मौजूद हैं। संभव है कि नई संसद के वास्तुकार बिमल पटेल ने अपने अनुभवों से यह समझकर संसद को दीर्घायु बनाने के लिए उसी वास्तु पर बनाने की योजना तैयार की। अंगरेजों की बनाई वर्तमान संसद भवन की आयु सौ साल ही है। 

वास्तुविद व इतिहास के जाने-माने विद्वान डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू का कहना है कि भारतीय वास्तु में गोल, त्रकोण और चौकोर-तीनों आकृतियों का विस्तार से वर्णन है। विश्वकर्म संहिता में इसके बारे में स्पष्ट निर्देश हैं। इसलिए विदिशा का मंदिर या मुरैना जिले के मितावली का वह मंदिर जिसकी डिजाइन के अनुरूप वर्तमान गोल संसद भवन बनाया गया, हमारे वास्तु का ही हिस्सा हैं। यही वास्तु संसद भवन बनाने वाले आर्किटेक्ट्स ने अपनाई। इसलिए यह कहना ठीक नहीं कि इन मंदिरों को देखकर संसद भवन बनाए जा रहे हैं। मध्यप्रदेश के उज्जैन में पाँचवी-छँठवीं शताब्दी में जन्मे प्राचीन विद्वान वराह मिहिर ने तीनों संरचनाओं का जिक्र किया है। राजा भोज ने भी अपने ग्रंथों में इनका विस्तार से विवरण दिया। यही नहीं, वे तो कहते हैं-’ मैं कुछ वर्णन कर रहा हूँ। पर राजा की जैसी इच्छा हो, वह वैसा वास्तु ले सकता है। त्रिकोण वास्तु गोमुख पर आधारित है। गाय का महत्व अधिक था इसलिए गाय पर हमने कई संरचनाएँ कीं और नामकरण किए, जैसे गवाक्ष, गोमुख, गोकर्ण, गोष्ठी, गोठ। शाला का नाम मत्स्य पुराण में गावी कहा गया है। 

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