चित्रकार, संगीतज्ञ, साहित्यकार जैसी विभिन्न कलाओं में माहिर तमिल भाषी दीपा हिन्दी लेखन में कविता और व्यंग्य में चर्चित नाम  हैं।

अध्यात्म कलाओं को समाहित करती  दीपा स्वामीनाथन से  सुषमा व्यास ‘राजनिधि’ की  बातचीत

सुषमा व्यास ‘राजनिधि’

प्रश्न— अपने जन्म, शिक्षा और रूचि के बारे में बताए।

दीपा—-मेरा जन्म  दिल्ली में हुआ। हालांकि मेरे पिताजी का परिवार उनके अल्प वय में ही पालक्काड ( केरल ) से दिल्ली आकर बस चुका था एवं मेरी माताजी का परिवार मेरे जन्म के कुछ एक दशक पहले ही दिल्ली में बस गया था। तमिल हमारी मातृभाषा है परन्तु साफ़ हिंदी मैंने अपने बचपन से केवल पिताजी को बोलते हुए सुना था। मेरी प्राथमिक शिक्षा दिल्ली में ही तमिल माध्यम में हुई। घर पर तमिल के अतिरिक्त हिंदी बोलने, पढ़ने का अवसर मुझे मेरे पिताजी के ही कारण मिला जो धीरे धीरे सरल, सहज हिंदी साहित्य के प्रति खिंचाव का कारण भी बना । स्कूल में भी हिंदी मेरे सबसे प्रिय विषयों में से एक रहा और अध्यापिकाओं से प्रोत्साहन मिलता रहा। इस बीच संस्कृत में भी रूचि बढ़ने लगी। निबंध, कविताएँ और लघु कथाओं से कॉपी भरने में आनद मिलता था मुझे। भारतीय शास्त्रीय संगीत घर के वातावरण का अभिन्न अंग रहा। गर्मी की छुट्टियों में या जब भी समय मिलता पेंटिंग करने के लिए उत्सुक रहती। अक्सर ख्यालों में खोई हुई सी मगन ही रहती थी मैं, जिसके कारण मुझे कभी चिढ़ाया जाता तो कभी डाँट पड़ती। स्कूल के बाद मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय से बी कॉम किया फिर विज्ञापन एवं विपणन संचार में स्नातकोत्तर करते ही नौकरी लग गई। कुछ समय के लिए आकाशवाणी दिल्ली – एफएम् में बतौर अनाउंसर कार्य करने का अवसर भी मिला। जीवन ने अब तक यही सिखाया था कि कुछ भी करने से पीछे न हटना, व्यक्तित्व को निखारता ही है।

प्र– साहित्य के प्रति रुझान कैसे हुआ ? लेखन में समाहित है ?

दीपा-जब में छठवीं कक्षा में पहुँची तब हम दिल्ली से नोएएडा आ चुके थे। 10 वीं कक्षा के बाद तो हिंदी और संस्कृत छूट से गए। संगीत और चित्रकला के लिए भी समय निकाल पाना मुश्किल हो रहा था। नोएडा से दिल्ली तक रोज़ का सफ़र अधिक समय ले लेता था। लाइब्रेरी से ली हुई किताबें साथ रखती थी, बस में समय मिलता तब पढ़ती। उपन्यास नहीं पढ़ पाती थी इसलिए लघु कहानियाँ मुझे लुभाती थीं। विवाह हुआ, घर गृहस्थी, नौकरी और बच्चों में खपा जीवन कला और साहित्य से बहुत दूर जा चुका था।  विदेश में रहकर, नए परिवेश, वहाँ के लोग, कला, भाषा, संस्कृति इत्यादि में भी रूचि बढ़ने लगी। एक लम्बे अंतराल के बाद दुबई में कला और संगीत ने दिनचर्या में फिर से जगह पाई।  बच्चों को जब चित्रकला का प्रशिक्षण देना आरम्भ किया, तब बच्चों की कलात्मकता और निष्कपटता ने मुझे स्पंदित किया।फलस्वरूप  2012 से कविताएँ फिर लिखने लगी। मन और मस्तिष्क का द्वंद गहन चिंतन का द्वार खोलता है। विचारों में गंभीरता आती है तो भावनाएँ और संवेदनाएँ आप ही मौन में शब्द ढूँढने और उन्हें गढ़ने लगते हैं। वो शब्द उसी भाषा में होते हैं जो मन को अति प्रिय होता है, सहज लगता है। मेरे लिए हिंदी लेखन वो माध्यम बना।

प्र- तमिल भाषी  होने के बाद भी आप हिन्दी में इतना उत्कृष्ट और स्पष्ट लेखन, वाचन , पठन कैसे कर लेती हैं ?

दीपा-इसका  श्रेय मेरे पिताजी,मेरी बुआओं और मेरी प्रिय हिंदी अध्यापिकाओं को जाता है। तमिल परिवार में रहते हुए भी सभी सदस्यों में भारत के हर प्रान्तीय भाषा, कला और संस्कृति के प्रति एक उन्मुक्त भावना रही है। बचपन में हिंदी उपन्यासों पर आधारित धारावाहिक, डांस- ड्रामा, नाटक, सिनेमा, हिंदी समाचार, हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत इत्यादि पूरा परिवार मिलकर देखता, सुनता था। साथ ही घर में परंपरागत रीतियों के चलते तमिल और संस्कृत से भी नाता बना रहा। समय समय पर रामायण,महाभारत, श्रीमद्भागवत, नारायणीयम् इत्यादि के कथा प्रसंगों का वाचन, श्रवण परिवार का चलन था। भाषा मन की सहजता का स्वर होता है, जितना और जैसे सुनते,पढ़ते हैं वैसी ही मानस पटल पर भी उसकी छाया पड़ जाती है। ऐसी अभिरुचियों के बीजारोपण में मेरे  सगे सम्बन्धियों की प्रधान भूमिका रही। मैंने हिंदी को नहीं, हिंदी ने मुझे चुना। विचारों को दिशा मिली और हिंदी ने मुझे अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया।

प्र- साहित्य और कला का अद्भुत संगम आपने कैसे कर लिया।लेखन, चित्रकारी और संगीत को कैसे आत्मसात किया?

दीपा-यह प्रश्न तो किसी भी कलाकार के मन में कौतुहल जगा देगा ! जब इतना कुछ साथ में प्रवाहित हो रहा हो तो उनका संगम होना भी स्वाभाविक है ! एक रचनाकार की सहज अभिव्यक्ति, चाहे विधा, शैली,भाषा, पद्धति, माध्यम, साधन कोई भी हो बिना समर्पण के सार्थक नहीं हो सकती। नियमित अभ्यास और नए  प्रयोगों से भीतर का कलाकार पोषित होता है, मौलिकता में निखार आता है और विचारों का परिमार्जन होता है । जैसे कूप से रोज़ थोड़ा थोड़ा नीर निकाले जाने पर और जल की उत्पत्ति होती है, कलात्मकता निरंतर सृजन से परिपक्व व ऊर्जान्वित होती है। रोज़ कुछ नया सीखते रहने का उत्साह इस प्रवाह का नियम है और पुरस्कार भी।

प्र- ये सब आप परिवार की जिम्मेदारियों के साथ कैसे सहजता से निभाती हैं ?

दीपा-प्रश्न जटिल भी है और सरल भी ! आज के बहु आयामी युग में सोशल मीडिया के रहते व्यस्तता अवश्य बढ़ रही है। दिनचर्या को संयम से सुव्यवस्थित करना और समय प्रबंधन करना अनिवार्य हो गया है सभी के लिए। एक कलाकार या रचनाकार के लिए ये बहुत जटिल है क्यूंकि प्रेरणा समय पूछकर ह्रदय के द्वार नहीं खटखटाती और दुनियावी कार्य प्रायः सृजन में अवरोध बन जाते हैं। देखा गया है कि स्त्री का सेवा भाव और परिवार के प्रति उसके दायित्व इतने विस्तृत होते हैं कि फुरसत या अवकाश नाम का पखेरू उसके आसमान में नहीं नज़र आता। कुछ वर्षों के लिए तो आसमान ही नहीं होता। यहाँ स्त्रियों को परिवार से खुलकर बात करने की आवश्यकता है और अपने आसमान को पाने के लिए अपने समय को सीमांकित करना उसके आत्महित से जुडी निजी ज़िम्मेदारी है! घर परिवार सबका है तो काम भी सबका होना चाहिए। दिन के आरम्भ में ही अधिकतर निश्चित कार्य समाप्त कर लेने से समय और सृजनशीलता में स्वतः तालमेल बैठने लगता है ! ये भी अपने आप में एक कला ही तो है।

प्र-आध्यात्म कलाओं को समाहित करने में क्या भूमिका निभाता है ?

दीपा-कला की प्रक्रिया ही अन्तः करण से जुडी है। यदि मन में प्रतिबन्ध हो तो सृजन नहीं हो सकता। किसी चित्र को देखकर काग़ज़ या कैनवास पर उसकी नक़ल उतारना या किसी का लिखा हुआ पढ़कर उसे अपने शब्दों में लिखना या किसी गीत को याद करके दोहराना सृजनात्मकता नहीं है। इनसे हुनर को, जो कि कला प्रक्रिया का एक अंग है उसे समझने में और अभ्यास से अनुशासन लाने में सहायता मिलती है। परन्तु सृजन तो स्वयं से जुड़कर उसमें तल्लीन होने की प्रक्रिया है जहाँ हम एक माध्यम स्वरुप ब्रह्मांड के चित्रपट का सूक्ष्म अंग बनते भी हैं और क्षण भर में विलीन भी हो जाते हैं । प्रकृति की मूल प्रवृत्ति सृजन है और प्रकृति की संतानें, हम सभों का सृजन शक्ति एक नैसर्गिक गुण है। इसे पहचानने और उसके अनावरण की प्रक्रिया, कलात्मकता है। जो आत्मा से उत्पन्न होकर, आत्मा के ही मार्ग से, आत्मा तक पहुँचे वो अनुभूति कला है। यही कारण है कि सदियों से मानव कला की ओर आकृष्ट होता आया है और आज के इस अंतर्द्वंद्व, टकराव, विरोध और संघर्षों से भरे युग में कला की भूमिका आध्यात्मिक स्तर पर घावों को भरने और व्यक्तित्व में संवेदनाओं को सिंचित करने का सुगम साधन है।

प्र– आगे आपका क्या लक्ष्य है। कुछ ऐसा बाकी है जो जीवन में करना चाहेंगी ?

दीपा-बहुत कुछ ! एक विद्यार्थी  मानती हूँ मैं स्वयं को । ये सोचकर ही उत्साहित रहती हूँ कि सीखने की न तो कोई उम्र है, न ही कोई सीमा ! वैसे तो मैं योजना बनाने में विश्वास नहीं रखती पर निकट दृष्टी में जो संभव है उसके लिए तैयार रहना भी आवश्यक समझती हूँ। लेखन कोई बढ़ा लक्ष्य तो नहीं था पर अब जब जीवन ने ये दायित्व सौंपा है तो क़लम को विचारों के मंथन से और नैतिक मूल्यों से माँज कर सामाजिक कुरीतियों और लैंगिक असमानता पर चलाने के लिए उद्वेलित रहती हूँ – विधा जो भी हो। निर्भीकता हमें अपनी अस्मिता के बोध के निकट ले जाती है और इसका लेखन में प्रतिबिम्बित होना लेखक और पाठक दोनों को समृद्ध करता है। इसके अतिरिक्त चित्र कला, डिजाइनिंग, संगीत भी सन्देश वाहक हैं जो हमारे मानवीय गुणों को महसूसने और विचारों को दिशा देने में प्रेरक, सहायक बनते हैं। इसलिए सपने न सही, उमीदें बहुत हैं ! विशुद्ध विचार रखने वाले रचनाकरों और कलाकारों से जुड़कर प्रेरणा और हिम्मत मिलती है। जैसे जैसे राह खुलेगी आगे तो क़दम बढ़ेंगे ही। मार्ग भिन्न भिन्न प्रतीत हों चाहे – ध्येय एक ही है ! स्वयं से साक्षात्कार !

 

 

 

 

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